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💐प्रेम की राह पर-22💐

24-जानते हो बाल्यकाल में, मैं जिन पौधों को लगाता था।वे सभी प्रसन्न होकर बढ़ते दिखाई देते थे।वे बहुत सुख देते थे मुझे।कितने अच्छे लगते हैं न वे छोटे छोटे।आम का पौधा लगाकर ऐसी स्थिति की निर्माण की प्रतीक्षा करते थे कि कल ही आम लग जावें।उन पौधों से कितनी आत्मीयता होती थी।बढ़े हो जाने पर सघन छाया भी देंगे।फल तो देंगे ही। यह आकुलता थी बाल्यकाल की।आगे की जीवन यात्रा कितनी जटिल थी।आशाएँ धूमिल होती जा रहीं थी।भूत के गर्भ में सब छिप गया।तब से कोई नया पौधा न लगाया था।तुम्हारी समझदारी को देखते हुए।अपने हृदय के आँगन में प्रथम बार शज़र-ए-इश्क़ लगाया था।आशावान थे और अधिक होते हुए मनन किया इसे निश्चित ही बढ़ा सकूँगा।अपने और तुम्हारे स्नेह रूपी जल से सींचकर यदि मन की सुन्दरता मिली तो निश्चित ही सुन्दर फल भी लगेंगे।किन्ना सुन्दर होता वह दृश्य।परन्तु हाय!सुखा डाला तुमने उस पौधे को अपने भंगुर ईर्ष्यालु और कच्चे स्नेह से जो नवीन किसलय से पल्लवित हो रहा था।वह कितनी अँगड़ाईयों में था और कहता था कितना मज़बूत है मेरा प्रेमिक संसार और तुमने उस बेचारे को कभी न सींचा स्नेह जल से।सीमित समय में तुम्हारे संहारक ताण्डव शब्दनृत्य ने।उखाड़ डाला उसे।कितनी पीर दी तुमने उसे।हाय तुम्हारी निर्दयता को क्या विशेषण दूँ।अब इस घटना ने इतना शिथिल कर दिया है कि इसे कभी पुनर्जीवित न कर सकूँगा।जीवन देने के कई प्रयास किए परन्तु शरीर पर स्वेद के चिन्ह ही दिखाई दिए और तुमने भय ही दिया।तुमने कभी उस प्रसन्नता के क्षण को मुझे न दिया जिससे मैं यह कह सकता कि चलो तुम्हें खेद तो हुआ ही और अभी भी निराशा ही है।कभी दिलाशा भी न देने का प्रयास नहीं किया तुमने।कितने निष्ठुर हो तुम।सड़े टमाटर जैसे खा भी नहीं सकते और बदबू तो देगा ही।सुन्दरता का व्यापार सांसारिक बाज़ार में नित नया है।रोज़ चुनो उस दिखावटी को।फिर वह प्रेम कहाँ रहा वह तो वासना हो गई और वासना तो कभी शांत न होगी।बिना ईश्वरीय कृपा के।वह ईश्वरीय कृपा प्रेम ही तो है।अंतःकरण पर पड़ने वाला वासना का जाल धर्मशील मानव के मन में भोगादि की मीनों को जाल के विरुद्ध गुण से बाहर नहीं निकालता है।वह उन्हें पालता है जब तक उस मानव का नाश न कर दे।हे मित्र!कहीं ऐसा ही जाल तो कहीं तुम्हारे मन में मेरे अतिरिक्त तो किसी और के प्रति तो नहीं।समय सबसे बड़ा मरहम तो है परन्तु उस घाव का अनुभव जो तुमने मुझे दिया उसे कौन सा मरहम स्वस्थ करेगा।कोई नहीं।मेरे पास कुछ नहीं है अब क्रोध के अलावा।मन करता है तुम्हे क्रोध से क्षार बना दूँ।पर यह प्रेम कहाँ रहेगा, हो जाएगी वासना।ख़ैर हर्फ़ दर हर्फ़ को तुम्हारे लिए जोड़कर अब शान्ति मिल जाती है।मुझे पता है तुम्हारे अन्दर अब ग्लानि का भाव है।उठ रहा है और खौल रहा है ग्लानि का समुन्दर।वह तुम तक सीमित है।वह समुन्दर मुझ तक नहीं अभी पहुँचा।बाढ़ लगा ली है मैंने तुम्हारी तसब्बुर की।वह सोखता रहता है सभी सांसारिक अंतर्द्वंद्व को।हे मूर्ख मित्र कभी किसी को बिना बात के स्नेह का सुख देकर देखो।निर्मल बन जाओगे।पगलू।

©अभिषेक: पाराशरः

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