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#रुबाइयाँ

पुतला हर वर्ष जलाते हो , मन का रावण मरा नहीं।
हुयी व्यर्थ धन की बरबादी , दशहरा हुआ हरा नहीं।।
विष की बैलें फूल रही हैं , गर्द हृदय की बढ़ती है;
मनुज प्रपंच रचाता है तो , मानवता में खरा नहीं।।

दश हरे तरु अगर लगाओ , दशों दिशा हो हरियाली।
वातावरण स्वच्छ होगा तो , पाये जीवन ख़ुशहाली।
ऐसे दशहरा मनाओगे , ममता ज़्यादा पाओगे;
सुख होगा आशीष धरा का , रोग शोक नहिं बदहाली।।

मेघनाद कुंभकर्ण रावण , हमको सभी चिढ़ाते हैं।
बुरे कर्म ख़ुद तो छोड़ चले , अब हमसे करवाते हैं।
शल्यचिकित्सा मन की करलो , ढोंग पाप छल अब छोड़ो;
रामायण के पृष्ठ-पृष्ठ सब, हमको ये समझाते हैं।

#आर.एस.’प्रीतम’
सर्वाधिकार सुरक्षित रचना

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