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प्रार्थना

हे प्रभु मेरी खुबीयों को नहीं अपितु मेरी खामियों को मेरे सम्मुख उजागर कर जिससे मैं हर क्षण कुछ बदलाव अपने सख्शियत में कर सकूं।
मुझे इतना तपा की मैं सोने से कुन्दन बन जाऊं।
मुझे बड़ा सा नाम दे न दे परन्तु एक अच्छे व सच्चे इंसान की पहचान अवश्य हीं देना।
तूं तो समदर्शी है सबकुछ जानता है,
मन के आन्तरीक भावो को पहचानता है।
तू रोम-रोम में रमता है
रक्त रूधिर सा बहता है
तू सब में ही समाया है
तू जग की निर्मल काया है
तेरा न आदि नाहीं कोई अंत है
तुझसे ही सृष्टि का सृजन
और तुझसे हीं अंत है।
फिर इतना तड़पाता क्यों है
मोह माया का लालच देकर
मानव को बहकाता क्यों है।
तृण भी तुझसे पूछ के डोले
गर हो कृपा तो मूक भी बोले
अंधा विश्व भ्रमण कर आये
पंगु नीश दिन दौड़ लगाये
हम सब तेरे बालक प्यारे
तुम बीन हमरा कौन यहाँ रे।
प्रणाम
आपका
पं. संजीव शुक्ल “सचिन”
31/3/2017

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