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16 Jun 2016 · 1 min read

प्रश्नचिन्ह (?)

गरीबी से त्रस्त और बेरोज़गारी से ग्रस्त,
एक पढ़े-लिखे का दुर्भाग्य,
अपनी जगह से कुछ हिला,
जब प्रगति के नाम पर,
‘घूस प्रशिक्षण केन्द्र’ खुलाl
ब्लैक में ही सही,
वह प्रवेश फॉर्म खरीद लाया,
और नीचे से ऊपर तक के,
सभी लोगों से मिल आया l
किसी के आगे गिड़गिड़ाया,
तो किसी का बिल चुकाया l
आखिरकार उसने फॉर्म भर दिया, और,
अग्रसारण हेतु प्रस्तुत कर दिया l
उत्तर मिला – “यहाँ के अनुशासन का ध्यान रखो,
जाओ, जाकर लाईन में लगो “l
उसने कुछ सोचा, फिर लाईन तक पहुंचा l
वहाँ भी गुल खिल रहे थे ,
लाईन में आगे आने और,
काम जल्दी कराने के लिये,
सभी लोग किसी न किसी से मिल रहे थे l
उसे लगा कि,
उसकी निराशाओं का फल पक गया l
आगे तो न जा पाया,
फिर भी लाईन में लग गया l
देर से ही सही, उसका भी नम्बर आया,
और उसने स्वयं को,
सबसे आगे खड़ा पाया l
मगर जब सिर उठाया,
तो बन्द कमरा नज़र आया l
कारण यह था कि,
सम्बंधित अधिकारी जा चुके थे ,
क्योंकि उसके पीछे और आगे वाले,
‘पिछले दरवाज़े से प्रवेश’ पा चुके थे l
वह हताश-निराश थक गया था,
और घूस प्रशिक्षण केन्द्र की विश्वसनीयता पर,
प्रश्नचिन्ह लग गया था l

(सर्वाधिकार सुरक्षित)

— राजीव ‘प्रखर’
मुरादाबाद
मो. 8941912642

Language: Hindi
Tag: कविता
436 Views
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