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Apr 29, 2022 · 5 min read

प्रकृति और कोरोना की कहानी मेरी जुबानी

हे ईश्वर
सुन लो मेरी पुकार।
अब आप ही करो
हमारे जीवन का उद्धार।
धरती लोक से यह आवाज़
चारों तरफ से गुंज रही थी।
और ईश्वर के कानों तक भी
यह बार-बार पहुँच रही थी।

ईश्वर ने अपने दूत से कहा !
तुम धरती लोक पर जाकर देखो,
यह कैसा शोर है मच रहा !
क्यों इंसान अपनी मदद के
लिए हमें हैं पुकार रहे!
दूत पहुँचा धरती लोक,
देखा इंसान हाथ जोड़े हैं खड़े।
मुझे बचा लो,मुझे बचा लो
वह ईश्वर से मिन्नत हैं कर रहे।
दूत ने इंसान से क्या बात है पूछा,
और सारी बात जानकर ले आया इंसान को देवलोक।
देवलोक में ईश्वर ने पूछा!
हे इंसान आप क्यों इतना चिल्ला रहे थे?

इंसान बोला, हे देव!
यह प्रकृति न जाने किस बात पर
हम पर क्रोध जता रही है ।
कोरोना नाम का बीमारी
लाकर हमें बड़ा सता रही है।
पहले तो यह थोड़ा बहुत
सताया करती थी।
कभी बाढ का रूप लेकर
हमें डराया करती थी।
तो कभी- कभी भुकंप से
प्रलय मचाया करती थी।
कभी-कभी कहीं आग बरसाया करती थी।
तो कभी-कभी तुफान रूप धड़
हाहाकार मचाया करती थी।

पर अब तो इसने अपनी
सारी हदें पार कर दी है।
अब यह कोरोना नाम की बीमारी
धरती पर लेकर आई है।
जिसके कारण धरती पर
चारों तरफ लाशें बिछ गई है।
जिसके कारण कई अपने
हमसे बिछड़ गये हैं।
कई को तो साँस लेने में भी
दिक्कत आ रही है।
हम बार-बार इस बीमारी से,
लड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
पर यह है कि जाने का नाम
ही न ले रही है।
ईश्वर उसके बातों को ध्यान से सुन रहे थे।
सब सुनकर उन्होंने दूत से कहा,
है दूत!प्रकृति को बुलाकर लाओ,
बोलो इंसान अपनी फरियाद लेकर आया है।
दूत ने जाकर प्रकृति को बुलाकर लाया।
प्रकृति भी दौड़ी- दौड़ी देव के पास आई।
बोली- हे देव !
आपने कैसे हमें याद किया?
देव ने इंसान की सारी बातें बताई।
यह सुनकर प्रकृति ने अपनी फरियाद भी लगाई।
बोली -हे देव !इसमें मेरा क्या दोष है?
अभी धरती पर जो कुछ भी हो रहा है
यह सब इंसानो का ही तो किया धरा हैं।
मै तो अपने संसार में संतुलन
बनाकर चल रही थी।
मैनें तो धरती, जल, हवा, अग्नि और
आकाश अपने जगह पर जीवन
रक्षक बनाकर स्थापित कर दिया था।
पर यह इंसान ,अपने स्वार्थ में आकर
मेरे द्वारा दिए गए हर एक
चीज को नुकसान पहुँचा रहा हैं
और इसका मोल ही न समझ रहा है।

यह अपने स्वार्थ में आकर धरती से
अंधाधुंध पेड़ों को काट रहा हैं।
जिसके कारण धरती पर
ताप भी बढ रहा हैं।
बर्फ पानी मे बदल रहा है।
जिसके कारण पानी अपना
विस्तार रूप लेकर,
बाढ का रूप धारण कर रही है।
और जो पानी हमनें इन्हें
पीने के लिए दिया था।
ये तो उसमे भी कई तरह के
जहर को घोल रहे हैं।
जिसके कारण पानी अब
पीने लायक न रह पा रहा है।

हे देव!पेड़ पौधा कटने के कारण
पहाड़ भी टूट-टूट कर गिर रहे हैं,
और कई पहाड़ को तो इंसान अपने स्वार्थ के लिए तोड़ रहे हैं।
जब पहाड़ ही न रहेगा तो
हवा की गति कौन रोकगा।
इसलिए हे देव !
हवा की गति भी तेज होकर,
तुफान का रूप धारण कर रही है।
और जो हवा हमने इंसान को
साँस लेने के लिए दिया था,
उसमें भी तो इंसानो ने
अपने स्वार्थ के कारण
कई तरह के जहर को मिला दिया है।

पेड़ के कटने के कारण हवा में
ऑक्सीजन की मात्रा भी कम हो गई है।
जिसके कारण इन सब का
दम घुट रहा है।
हे देव! अग्नि भी जो अपना
प्रकोप दिखा रहा है
उसका कारण भी पौधे का कटना
और धरती से जल का नष्ट
होना ही हैं।
जिसके कारण धरती का ताप बढ रहा है।
जिसके कारण अग्नि भी अपने आप को
फैलने से नहीं रोक पा रही है।
धरती पर जो ज्यादा भूकंप आने लगा है।
इसका कारण भी तो यह इंसान ही है,
जिसने अपने स्वार्थ में आकर
धरती को
प्लास्टिक से ढक दिया हैं।
धरती से पेड़ – पौधे को काटकर
उसका भार बढा दिया है।

हे देव! यह इंसान अपने स्वार्थ में
आसमान को भी नही छोड़ रहा हैं ,
यह तो अब आसमान को भी
बार-बार चोट पहुँचा रहा हैं।
जिसके कारण ओजोन परत
पर भी प्रभाव पड़ने लगा है,
और वो भी धीरे-धीरे नष्ट हो रहा है।
अब आप बताओ, हे देव!
मैं दोषी कैसे हो गई!
जबकि सारे प्राण रक्षक चीजों का
नुकसान तो ये इंसान खुद से कर रहा है।
और अपने असमय मौत का कारण खुद ही बन रहा हैं।
धरती लोक पर एक कहावत प्रचलित है
रोपे पेड़ बबुल का,
तो आम कहा से खाए।
हे देव !
जब यह इंसान खुद अपने
हाथों ही प्राण रक्षक
चीजो को नष्ट कर देगा,
तो इसका प्राण कैसे बच पाएगा?
रहा सवाल मेरे इस कोरोना
नाम के बीमारी का
तो ,हे देव !
आपने जिस तरह शिशुपाल की
सौ गलती को माफ करने
के बाद ही मारा था।
उसी तरह मैं भी सौ साल तक,
सारे कष्ट खुद पर झेलती हूँ
फिर महामारी का रूप धारण करती हूँ।
ताकिअपने प्राण रक्षक चीजो का
संतुलन फिर से बना सकूँ।
और यह सब इसलिए करती हूँ,
ताकि धरती पर जीवन चलता रहे।

मैने इन्हें कई बार छोटी-छोटी यातना
देकर समझाने की कोशिश की
यह बार-बार बताया कि पेड़ और जल
हमारे जीवन के लिए वरदान है।

पर यह इंसान हमारे बातो को
समझने को तैयार नहीं था।
देव प्रकृति की बातों को
ध्यान से सुन रहे थे ।
साथ में इंसान भी सब सुन रहा था ,
पर कुछ बोल नहीं पा रहा था।

फिर प्रकृति ने कहा- हे देव !
अब आप ही फैसला करें।
ईश्वर ने कहा-
मैं प्रकृति के बात से सहमत हूँ।
आप क्या सोच रहे हो इंसान ?
इंसान चुप रहा ,
उसे अपनी गलतियों का
एहसास हो रहा था।
उसे अब समझ मे आ रहा था कि
जिस पीने वाली पानी की कीमत,
वह इतना पैसे देकर चुकाता है।
उसे तो प्रकृति ने मुफ्त मे दिया था
और उसने कभी उसका कदर न किया था।
वह हवा के बार में भी सोच रहा था।
जिस ऑक्सीजन को प्रकृति ने
उसे मुफ्त मे दिया था।
आज साँस लेने की एक क्षण की कीमत
उसे हजारो मे देना पर रहा है,
और कई के तो आक्सिजन न मिलने कारण प्राण भी चले गए।

इंसान यह सब सोच ही रहा था कि
देव ने कहा-हे इंसान!
प्रकृति के बातों पर तुम सब ध्यान दो।
नहीं तो धरती लोक में और प्रलय मच जाएगा।
अब धरती पर जाकर ज्यादा से ज्यादा पेड़ – पौधे लगाओ और
जल का संरक्षण करो।
प्रकृति को भी शांत रहने को कह कर
दोनो को धरती लोक भेज दिया।

~अनामिका

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