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पुस्तक की पीड़ा

पुस्तक
विमोचन
मजमा
और तकरीर
कौन पढ़ता
है यहाँ मियां
तेरी तहरीर।।

बंद ज़िल्द
खुलती नहीं/और
कसीदे पढ़ते हैं अक्सर
समय की तराजू पर ये
मासूम हैं कितने अक्षर।

हर अक्षर की अपनी
जुबां होती है..
वक़्त ख़राब है इन दिनों
मुश्किल होती है

सुना है, शब्द भी/ कौम
जाति/मज़हब में बंट गए
तभी तो/ बिना पढ़े ही वो
मज़बून समझ गये।।

पीर को खुला रख
पुस्तक में न बंद कर
पीर पराई कभी भी
अपनी नहीं होती।।

अच्छा हुआ, मेरी कोई
पुस्तक नहीं आई
कह रहे हैं जाँनिसार
मिरे, हम तरस गए।।

सूर्यकांत द्विवेदी

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