Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
17 Apr 2022 · 1 min read

पिता

घर परिवार की जिम्मेदारीयों को निभाता रहता
हर घर में वो जो है पिता.

बच्चो बीबियों की खुशियों के ख़ातिर
अपना हर ग़म छुपा लेता है पिता.

जी तोड़ मेहनतक़शी करता वो
की उसके परिवार खुश रह सकें

परिवार की खुशियों के ख़ातिर
क्या क्या नहीं करता है पिता?

जैसे ही उसे बुलाता है पापा कोई?
खुशनुमा एहसास से भर जाता है पिता.

पिता बनते ही उसकी जिम्मेदारी हो जाती शुरू
बच्चों की खुशियों मे होने लगती उसकी भी खुशी.

बच्चों के हर ज़िद पूरे करता है पिता
अपनी जरूरतें अब सिर्फ़ ख़्वाहिशों मे दबा लेता है पिता.

घर कितना मायूस सा लगता
जब घर में नहीं होते हैं पिता?

उन्से पूछो तकलीफ़ कभी तुम सभी?
जिनके सिर से उठ गया साया पिता का?

कवि- डाॅ. किशन कारीगर
(©काॅपिराईट)

नोट- काव्य प्रतियोगिता के लिए मौलिक एंव स्वरचित रचना.

Language: Hindi
Tag: कविता
7 Likes · 12 Comments · 435 Views
You may also like:
*अध्यापक महोदय के ऑनलाइन स्थानांतरण हेतु प्रबंधक की अनापत्ति*
Ravi Prakash
टूटा हुआ दिल
Anamika Singh
चुरा कर दिल मेरा,इल्जाम मुझ पर लगाती हो (व्यंग्य)
Ram Krishan Rastogi
छठ महापर्व
ब्रजनंदन कुमार 'विमल'
*आधुनिक सॉनेट का अनुपम संग्रह है ‘एक समंदर गहरा भीतर’*
बिमल तिवारी आत्मबोध
जब-जब देखूं चाँद गगन में.....
अश्क चिरैयाकोटी
✍️कुछ बाते…
'अशांत' शेखर
💐💐परमात्मा इन्द्रियादिभि: परेय💐💐
शिवाभिषेक: 'आनन्द'(अभिषेक पाराशर)
माँ शैलपुत्री
Vandana Namdev
दस्तूर
Rashmi Sanjay
महंगाई के दोहे
महावीर उत्तरांचली • Mahavir Uttranchali
दीदार ए वक्त।
Taj Mohammad
विद्या पर दोहे
Dr. Sunita Singh
अगर नशा सिर्फ शराब में
Nitu Sah
अपनी घड़ी उतार कर मत देना
shabina. Naaz
जंगल के राजा
Abhishek Pandey Abhi
'वर्षा ऋतु'
Godambari Negi
मां क्यों निष्ठुर?
Saraswati Bajpai
जस का तस / (नवगीत)
ईश्वर दयाल गोस्वामी
तुलसी दास जी के
Surya Barman
🙏महागौरी🙏
पंकज कुमार कर्ण
छलिया जैसा मेघों का व्यवहार
Umesh उमेश शुक्ल Shukla
दिल चाहता है...
Seema 'Tu hai na'
जीभ/जिह्वा
लक्ष्मी सिंह
मुक्तक
प्रीतम श्रावस्तवी
I was sailing my ship proudly long before your arrival.
Manisha Manjari
आज़ाद हो जाओ
Shekhar Chandra Mitra
"मातल "
DrLakshman Jha Parimal
पथिक मैं तेरे पीछे आता...
मनोज कर्ण
लिख लेते हैं थोड़ा थोड़ा
सूर्यकांत द्विवेदी
Loading...