पिता एक सूरज

निकल पड़ता हर दिन, जीविका कमाने को।
रख दिल मे परिवार, चला खुशियां लाने को ।।
न थकता न ही शिकन है,
पिता है,ना पत्थर दिल है।
पसीना वो बहा आता है,
सह जाता है जमाने को ।। निकल पड़ता —
सुत और सुता सम ही जाने,
बेटी को अधिक प्रिय माने ।
देता कुंजी, जीवन समझाने,
उठते कंध पितृ,भार उठाने को।। निकल पड़ता —-
उजाला है रोशन घर वो पिता,
सूरज सम ही होता वो पिता ।
बच्चों का बैंक कोष वो पिता,
दौड़ पड़े खुशियां बुलाने को।। निकल पड़ता —
पालक से ही भविष्य बन पाता,
बालक के जीवन का है निर्माता।
माता छांव तो पिता है छाता,
वो कर्ज में चढ़ा,जी जाने को।। निकल पड़ता —
तन मन अर्पण ,बाल स्वप्न को,
पिता का पसीना भी है, नमन को,
भूलो न नींव, चढ़े जब मंजिल को,
याद रखो तुम,उस बचपन को।। निकल पड़ता —

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