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पहुँचूं मैं कैसे प्रियतम के आंगन -गीत

पहुँचूं मैं कैसे प्रियतम के आंगन -गीत
( पहाड़ में रिवाज -नव दुल्हन अपनी पहली बरसात मायके में गुजारती है-
उसके विरह ग्रस्त मन की व्यथा )

स्पर्श-स्वाद-स्वर-आँख-गंध में साजन
पहुँचूं मैं कैसे प्रियतम के आंगन I

काला महीना, हैं घनघोर बादल
इठलाती धरा परिधान हरयावल
रिवाज व रीतें निभाती यह दुनिया
नव दुल्हन उदास घर तेरे बाबुल
तापित विरह से व्याकुल हुआ मन
पहुँचूं मैं कैसे प्रियतम के आंगन I

बादल गड़कते जब बिजली लश्कती
चूड़ियाँ खनकतीं, व पायल छनकती
बिच्छुए सुन के उँगलियों में गुमसुम
पवन की अठखेलियाँ-अलक मचलती
पग हो गये निर्लक्ष्य, बेसुध दामन
पहुँचूं मैं कैसे प्रियतम के आंगन I

अतृप्त धरा तप्त, बारिश न फुहारें
बावले हो नयन हर ओर निहारें
हर रोम रोमांचित, हर सांस बेकल
कहाँ तुम हो साजन-साजन पुकारें
कोयल कूके सुनाए गीत पावन
पहुँचूं मैं कैसे प्रियतम के आंगन I

बादल बरसे, नहीं मुझको खबर है
दुनिया भीगी, नहीं मुझको असर है
बहका-बहका है मन उमस भरा तन
गर्म सांसों की ठंडक ,स्वप्न भर है
उफनते दरिया-सा उफनता यौवन
पहुँचूं मैं कैसे प्रियतम के आंगन I

——————————-
डॉ. कंवर करतार (हि. प्र.)

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