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पटल समीक्षा-215वी़- जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़

*215वीं -आज की समीक्षा*

*समीक्षक – राजीव नामदेव राना लिधौरी’*

*दिन- सोमवार* *दिनांक 14-6-2021

*बिषय- *कलाकंद (बुंदेली दोहा लेखन)*

आज पटल पै *कलाकंद* बिषय पै *दोहा लेखन* कार्यशाला हती।आज कलाकंद से मीठे दोहे रचे पढ़के मों में पानू आ गऔ , मन खुश हो गव।सो जितैक जनन नें लिखौ उने हम बधाई देत है कै कम सें कम नये बिषय पै नओ लिखवे की कोसिस तो करी है,भौत नोनों लगो।
आज सबसें पैला *श्री अशोक पटसारिया जू नादान लिधौरा* ने कलाकंद कौ भोग लगाऔ बढ़िया दोहे लिखे है बधाई।
अबै ओड़छे में लगत,कलाकंद कौ भोग।
लगा सरकार खों,पाते हैं सब लोग।।
अब सो कूंडा देव में, कलाकंद भरमार।
बंदरन सें बच जाय सो,पाव पाल्थी मार।।

*2* *श्री प्रदीप जू खरे, मंजुल,टीकमगढ़* से लिख रय कै- रामराजा सरकार कौ कलाकंद भौत भाउत है इकौ प्रसाद चढ़ाएं से भगवन जो दंदफंद आत है वे सब मिट जात है। नोने दोहा रचे है मंजुल जी बधाई।
मौ में पानी आत सुन, कलाकंद कौ नाम।
सबसें नौनौ मिलत है,चलौ ओरछा धाम।।
कलाकंद सरकार की,सुनियौ पैलि पसंद।
भक्त भाव सें भेंटता, छूट जात भव फंद।।

*3* *राजीव नामदेव “राना लिधौरी” टीकमगढ़* लिखते है कै जो कलाकंद कौ परसाद पाते हैं उनके तन और के सभी कष्ट मिट जाते हैं ।
कलाकंद जो प्रेम सें,प्रसादी है पाव।
मिट जावे ऊके सभी, तन-मन के फिर घाव।।
कलाकंद तो है इतै,राम चन्द्र कौ भोग।
उनकी किरपा से इतै,मिट जाते सब रोग।।
*4* श्री जयहिन्द सिंह जू जयहिन्द,पलेरा* सांसी कै रय कै जबसें बर्फी बेटी आई है सो कलाकंद कम बिकन लगो है कलाकंद बनावे की विधि भी बता रय है सभी बेहतरीन दोहे है बधाई दाऊ।
कलाकार सब लेत हैं,कलाकंद आनंद।
बरफी बेटी आइ सो,कलाकंद भव बंद।।
शक्कर मावा घोंट कें,मेवा देव मिलाय।
कलाकंद की कला में,भौत मजा आ जाय।।

*5* *श्री परम लाल जू तिवारी,खजुराहो* कलाकंद की पैचान बता रय के सबसे नौनो वो होत है जो दानेदार हो। अच्छे मीठे दोहे रचे है बधाई।
लख मिठाई दुकान में,कलाकंद को ढेर।
मूं में पानी भरत है,खा लें होय न देर।।
कलाकंद अच्छो वही,जो हो दानेदार।
खावो सब मिल बैठ कै,बढै प्रेम परिवार।।

*6* *श्री रामेश्वर प्रसाद गुप्ता इंदु.बडागांव झांसी उप्र* से बता रय के कलाकंद में का का डरत है तब स्वाद बनत है। बढ़िया रचे है। बधाई।
कलाकंद में रय रवा, गुलाब पंखुरी डार।
किसमिस और चिरोंजियां, ऊ में परी हजार।।
कलाकंद देहात में, बर्फी शहर बिकाय।
दाने दार सुवाद खों, कोई भुला न पाय।।

*7* *श्री गुलाब सिंह यादव भाऊ लखौरा टीकमगढ़* से कत है कै मिठाई कौ दद्दा दूद है और कलाकंद कि बैन बर्फी है। कौनउ कम नइयां। उमदा दोहे है बधाई।
कलाकंद की बैन है,मलाई बर्फी ऐक।
कलाकंद से कम नई,भईया खाके देक।।
सबको दददा दुध है,जो माखन बन जात।
कलाकंद परिवार है,बर्फी लड़डु खात।।

*8* *श्री शोभारामदाँगी नंदनवारा *लिखत है कै सड भोगन से नोनो है कलाकंद को भोग। उमदा दोहे है बधाई।
कलाकंद कौ नाव सुन , मुँह में पानु आय ।
खाऊतते जब सब जन, गालन चिकन दिखाय ।।
सब भोगन कों भोग जौ, कलाकंद सिरमौर ।
जासैं मैमा भौत है, न बरफी पेड़ा और ।।

*9* *श्री प्रभु दयाल श्रीवास्तव पीयूष टीकमगढ़* से लिख रय कै कलाकंद की खूश्बू ही मनमोह लेत है। शानदार दोहे है बधाई।
खोबा में मेबा मिला,मन सें करी घुटाइ।
कलाकंद के रूप में,साजी बनी मिठाइ।।
कलाकंद की बास सें,मन में घुरी मिठास।
मन मसोस मों मूंद ल‌औ,प‌इसा न‌इंयां पास।।

*10* *श्री डी.पी. शुक्ला’सरस, टीकमगढ़* ने दोहा में अनुप्रास अलंकार का नौनो प्रयोग करो है बधाई।
जात जित जन जवईं जे। जाचक जँह जिय जान।।
चाहत चितव चित्त चढ़त,कलाकंद भगवान।।
कनक भवन के जाय सें। मँहक देत कलाकंद ।।
लै लगात श्री राम कों,मिटत पाप के फंद।।
*12* श्री अरविन्द श्रीवास्तव,भोपाल* से कै रय कै नयी पीढ़ी कलाकंद कौ नाव नइ जानत सही बडे शहरन में जौ का धरो। अच्छा लिखा है बधाई।
खोवा मिश्री सें बनी, भली मिठाई खात,
पेट भरै, मन ना भरै, कलाकन्द कहलात ।
दौर मिठाई कौ थमो, अब नइँ रव वौ चाव,
नइ पीढ़ी खौं का पतौ, कलाकन्द कौ भाव ।

*13* *श्री एस आर सरल, टीकमगढ़* से लिखते हैं कि- हाट में कलाकंद ऐन बिखत है। अच्छे दोहे है बधाई।
कलाकंद की हाट मे,भौतइ चलै दुकान।
भौजी दम सै बैच रइ,बना बना पैचान।।
कलाकंद खौ बैच रइ,कलाकार भौजाइ।
औनै पौनै तोल कै, उल्लू रई बनाइ।।

*14* *श्री -अभिनन्दन गोइल, इंदौर* से कय रय कै- कलाकंद बनाबौ सोउ कला है जो केवल मिठया ही जानत है । अच्छा लिखा है बधाई ।
मावा हो ताजौ बनौ, बूरौ लेव मिलाय।
डार लायचीं चिरोंजीं, कलाकंद बन जाय।।
मिठया जू की कला सें, कलाकंद कौ मान।
लडुआ-पेरा छोड़ कें ,परसौ जौ जजमान।।

*15- * डॉ रेणु श्रीवास्तव भोपाल* से लिखतीं है कै कलाकंद बुंदेलखंड की शाध है सही है। बधाई बेहतरीन दोहे है।
कलाकंद जा बनत है, बड़ी कला के साथ।
पकरें पकरें डेउआ, ठिठुर जात जे हांथ।।
कलाकंद जा बन गई, बुन्देलन की शान।
और दूसरे शहर में, ई की ना पहचान।।

*16* *श्री कल्याण दास साहू “पोषक” पृथ्वीपुर* से कै रय- कलाकंद कौ परसाद आदमी दोर दोर के लेत है छोडत नइयां। ऊमदा दोहे है। बधाई।
खोवा बूरौ सानकें , मधु-मेवा संजोग ।
ठाकुर-जू खों भौत प्रिय , कलाकंद कौ भोग ।।
जितै बँटत दिख जात तौ , कलाकंद परसाद ।
दौर – दौर कें लेत ते , भूलत नइंयाँ याद ।।
*17* * श्री संजय श्रीवास्तव, मवई, दिल्ली* से लिखते हैं- आदमी कौ सुभाव कलाकंद सौ मीठो और नरम भव चाहिए। सुंदर चिंतन मय दोहे है बधाई।
कलाकंद सौ भाव हो,मीठो होय स्वभाव।
मन में मिश्री घुरी हो, होत सरस बतकाव।।
कलाकंद सौ आदमी, जौन दिना हो जाय।
लगे गुरीरौ रामधइ,भीतर घुर-घुर जाय।।

*18*डॉ सुशील शर्मा, गाडरवाड़ा से गोरी की तुलना कलाकंद से करते हुए लिखते हैं कै-
कलाकन्द गोरी लगे, देखत मन मिठ आय।
हँस हँस के बातें करे, फिर भी मन न भराय।।
कलाकन्द मीठो लगे खोवा शक्कर घोल।
सब मिठाई बाजू रखोकलाकन्द अनमोल।।

*19* *श्री लखनलाल जी सोनी छतरपुर से कत है कै-
कलाकंद खों देख कै,मौ पानी आ जात ।
अदाधुंद जो विकत है, लै के सवरै खात।।
*20* श्री हरिराम राय खरगापुर से लिखते हैं कै- कलाकंद के भौत अर्थ होत है। अच्छे दोहे है बधाई।
गायन, वादन, नाचना, कला कंद संगीत।
लिखना, पढ़ना, बोलना, कला की नोनी नीत।।
कंद अर्थ भी बहुत हैं, कलाकंद के संग।
फल, समूह, रस, मूल गुण, हरि हैं रामानंद।।

*21* श्री राजगोस्वामी दतिया से के रय कै कलाकंद कितैकइ खाव मन नइ भरत है।
कलाकंद खा जीभ खो मिल जातइ आनन्द ।
निकरत मीठे वचन तब सबइ कछू सानन्द ।।
कलाकंद नमकीन संग खूबइ खब खब जात ।
खात खात जौ लगत है मिलवै और बिलात ।।

*22* *श्री वीरेन्द्र चंसौरिया टीकमगढ़ से कै रय कै जब वे दतिया जात सो उतै से कलाकंद ल्यात है-
कलाकंद कौ नाव सुन,मौ सें टप कत लार।
खाबे जो देगा मुझे,उसकी जय जयकार।।
कलाकंद कौ स्वाद तौ , सबखों खूब सुहात।
घर पै लै कें आत हैं,जब भी दतिया जात।।

ई तरां सें आज पटल पै 22कवियन ने अपने दोहा अपने अपने ढंग से पतरा से दोहा पटल पै पटके, पै जै दोहा बिल्कुल कलाकंद से हते। बुंदेली दोहे के इतिहास में ये दोहे अपना स्थान जरुर बना लेंगे ऐसा मुझे विस्वास है। सभइ दोहाकारों को बधाई।

?*जय बुंदेली, जय बुन्देलखण्ड*?

*समीक्षक- ✍️राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’, टीकमगढ़ (मप्र)*

*एडमिन- जय बुंदेली साहित्य समूह टीकमगढ़#

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