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6 Sep 2016 · 1 min read

पंचतत्‍व में

रे मानव
,
अब भी सम्‍हल
मौत गूँगी सही
बहरी सही

अंधी सही

पर ! तेरे पास
पहुँचने से पहले
कितने संदेश तुझे भिजवाये,
पर ! तू समझे तब….
बाल सफेद हुए
फिर भी न सम्‍हला !
दृष्टि धूमिल हुई
फिर भी न बदला !!
दाँँत गिरने लगे
फिर भी न लगा !!!
कि कोई पास आ रहा है
तेरे जीवन में
तेरे डगमगाते
जर्जर शरीर को
पंचतत्‍व में
विलीन करने के लिए।

Language: Hindi
Tag: कविता
310 Views
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