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पँख टूटे हैं तो क्या परवाज़ करते

पँख टूटे हैं तो क्या परवाज़ करते 
पोच है तक़दीर तो क्या नाज़ करते 

बेच आये अपने ही जब दिल हमारा 
फिर भला हम क्या उन्हें नाराज़ करते 

किस तरह करते शिकायत हम ख़ुदा से 
कर दिया गूँगा तो क्यों आवाज़ करते 

यूँ मुझे तुमने कभी चाहा कहाँ था 
इक दफ़ा ही काश! तुम आवाज़ करते 

हो गई ग़ुस्ताख़ियाँ कुछ बेख़ुदी में 
वरना उनको और हम, नाराज़ करते

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