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#28 Trending Post
Nov 5, 2021 · 38 min read

नौहा, कलीम यूसुफपुरी

1
शिम्रे लईन बनके शैतान जा रहा है
सर काटने को शह का, हैवान जा रहा है

हट जा यज़ीदी लश्कर, हाथों में लेके ख़ंजर
मैदाँ में बन के अकबर तूफ़ान जा रहा है

मैदाँ में जा रहे हैं शमशीर लेके अकबर
इक माँ के दिल का देखो अरमान जा रहा है

हाथों पे लेके उसको घर से चले हैं मौला .
छः माह का जहाँ से मेहमान जा रहा है

बानो की छीनी चादर क्या तुमने ये भी सोचा
ऐ शिम्र आज तेरा ईमान जा रहा है

पानी के बदले नाज़ुक गर्दन पे तीर खा कर
कर के जहाँ पे असगर एहसान जा रहा है

सब लुट गया है रन में बाकी बचे हैं सरवर
सर पे कफ़न लपेटे सुल्तान जा रहा है

शह लेके जा रहे हैं गोदी में बेज़ुबाँ को
मासूमियत का घर से सामान जा रहा है
सर है कलीम नेज़े पर शाहे कर्बला का
क़ुर्बान होके दीं पे ज़ीशान जा रहा है
(मेरा पहला नौहा,अन्जुमन निज़ामिया)
2
ख़ेमा में जब आया लाशः ख़ून में डूबा असग़र का
चींख उठी मज़लूम सकीना देख के कुर्ता असग़र क

हाय सकीना प्यास की मारी डूब गई है ग़म में बेचारी
सिसक सिसक के देख रही है खाली झूला असग़र का

सुग़रा ने ख़त में लिक्खा है भईया असग़र कैसा है
सोच रही है कैसे बताऊँ हाल सकीना असग़र का

तेरा रोना रोना हाय सकीना क्यूँ न फटे ज़ोहरा का सीना
सुबह सुबह जब ढूंढ़ के रोए चांद से चेहरा असग़र का

नन्हा मुजाहिद सुखा गला था, गोद मे शह की रन मे चला था
अर्ज़ो शमा ने बाज़ु पे शह के, देखा मचलना असगर का

नन्हें मुजाहिद के चेहरे का हुस्न बयाँ हो कैसे कलीम
कैसे कहें हम चाँद का टुकड़ा, चाँद है टुकड़ा असग़र का
3
अश्क़ों का समंदर है और ग़म की रवानी है
मक़तल के शहीदों की पुरदर्द कहानी है

मासूम गले पर यूँ मत तीर चला ज़ालिम
इस फूल से बच्चे पर कुछ रहम तो खा ज़ालिम
बेशीर है प्यासा है बानों की निशानी है

अब्बास की राहों पर है आस सकीना की
शायद न बुझेगी अब ये प्यास सकीना की
मश्किज़ा तो आया है पर उसमें न पानी है

ये कौन है रन में जो बुलबुल की तरह चहके
शमशीर है हाँथो में शोलों की तरह दहके
हमशक़्ले पयम्बर है, ये युसुफे शानी है

मैदान में जाते हैं सुल्तान ज़माने के
अब खूँ में नहाते हैं सुल्तान ज़माने के
सजदे में ये खंज़र है,ज़ोहरा की निशानी है

आँसू है रवाँ आंखों से हाय कलीम अब तो
करबल की ज़मीं पर है ये कैसा सितम देखो
सह रोज़ के प्यासों पर पानी की गुरानी है
2013
4
शाहे उमम के हल्क़ पे जब शमशीरे बरहना चलती है
दर्द के मारे आज ज़मीं,मक़तल की ख़ूब मचलती है

नन्हा मुजाहिद रन में है, बिमार है आबिद ऐ मौला
बाली सकीना भी करबल की,रेत पे कब से जलती है

बेपर्दा ज़ैनब है लोगों, सब्र का दामन छूटता है
ढांप के मुंह ज़ुल्फों से ज़ैनब घर से आज निकलती है

सिब्ते पयम्बर रन में गए, फ़र्ज़न्द हैं फ़ातहे ख़ैबर के
हांथ में है शमशीर अली जो रन में आग उगलती है

सोच के है घबराती ज़ैनब,कल जब नंगे सर होगी
सुबह का आलम कैसा होगा,आज तो शाम ये ढलती है

इतनी है नाज़ुक नन्ही सकीना कैसे सहे ग़म बाबा का
ऐसे पिघलती है वो ग़म में जैसे शम्मा पिघलती है

कैसे “कलीम उसको समझाऊं,भईया अब नहीं आएंगे
याद में बैठी है दर पे सुग़रा,ग़म की आग में जलती है
13-10-2015
5
मग़मूम है सकीना तो चेहरा उदास है
कर्बल में अहले बैत का ख़ेमा उदास है

ख़ूने अली है दश्त में महशर की धूप है
लरज़े में आसमान है सहरा उदास है

मुरझा गई है प्यास से बेटी हुसैन की
आबे र-वाँ है चश्म से, दरिया उदास है

ज़ैनब ने अपनी ज़ुल्फ़ का पर्दा बना लिया
बिन्ते अली को देख के पर्दा उदास है

ये सफ़ शिकन नसीब में होगा न फिर कभी
सिब्ते नबी के सर का अमामा उदास है

ज़ैनब ये कह रही है जरा देखिए हुसैन
ग़ुंचा दहन नहीं है तो झूला उदास है

जब कर्बला में रूए बहत्तर हुए शहीद
आले नबी का देखिए कुन्बा उदास है

रोना ग़मे हुसैन में सुन्नत है मोमिनों
रोए हैं ख़ुद रसूल भी रौज़ा उदास है

क़ाबे को जिस पे नाज़ है मक़तल में ऐ कलीम
है आख़री नमाज़ ये सजदा उदास है
6
अकबर है या रसूल की तस्वीर ख़ून ख़ून
नूरे खुदा के नूर की तनवीर ख़ून ख़ून

कासिम शहीद हो गए बेवा हुई दुल्हन
कुबरा के ख़्वाब की हुई ताबीर ख़ून ख़ून

बीमार बेवतन है ये, ईज़ा न दो इसे
आबिद के हाथ की हुई ज़ंजीर ख़ून ख़ून

शेरे खुदा का बेटा बकफ़ ज़ुल्फ़िक़ार था
मक़तल में हो गई वही शमशीर ख़ून ख़ून

जो हल्क़ बोसा गाहे रसूल ए ज़मान था
लो हो गई वह गर्दन ए शब्बीर ख़ून ख़ून

सब कुछ लुटा के आ गए बाज़ारे शाम में
ज़ोहरा की आज हो गई जागीर ख़ून ख़ून

हल्के हुसैन बोसा गहे ख़त्म ए अंबिया
उसके लहू से हो गई शमशीर ख़ून ख़ून

दश्त ए बला में ख़ून के छींटे थे हर तरफ
क्यों कर न हो कलीम की तहरीर ख़ून ख़ून
7
ईन्ना आतैना कल कौसर, इन्ना आतैना कल कौसर
जुबाँ है सूखी गले पे ख़ंजर जिधर भी देखो है खूनी मंज़र
इन्ना आतैना कल कौसर۔۔۔۔۔

हुसैन को ऐ सताने वालो, दिखा के पानी गिराने वालो
बताओ कैसे मिलेगा तुमको ,हमारे मरने के बाद कौसर
इन्ना आतैना कल कौसर…..

यूँ राहे हक़ में कटा के सर को,बचाया नाना के दीने हक़ को
जवान बेटे का ग़म है दिल में,ख़याम गह में बपा है महशर
इन्ना आतैना कल कौसर…..

हर एक वादा वफ़ा किया है,कटा के सर को दिखा दिया है
शहीदे आज़म वो बन गए हैं, लुटा के घर बार रन में सरवर
इन्ना आतैना कल कौसर…..

जुबाँ है सुखी, है फूल सा तन,हुसैनो बानो का लाडला है
शहीद होने को जा रहा है, लो शह की गोदी में नन्हाअसग़र
इन्ना आतैना कल कौसर….

जवान अकबर की लाश लेकर हुसैन ख़ेमे को जा रहे हैं
लहू के आँसू रुला रहा है ये कर्बला का अजीब मंज़र
इन्ना आतैना कल कौसर….

यतीमों को तुम सता रहे हो,अली के घर को जला रहे हो
जहानो जन्नत का शाह देखो हुआ है दश्ते बला में बेघर
इन्ना आतैना कल कौसर…..

ज़मीने करबोबला में लोगो ,हमीं को जन्नत दिलाने वाला
उसी के तन पे रवां है ख़ंजर, जो सारे जग का है शाहे अतहर
इन्ना आतैना कल कौसर….

करे बयाँ अब “कलीम” कैसे ,नबी के घर की वो आहोज़ारी
ग़मे शहीदाँ में आँखें नम हैं,बपा न हो जाए दिल में महशर
इन्ना आतैना कल कौसर…..
8
हुसैन कर्बला में हैं तमाम ग़म लिए हुए
चमन को अपने देखते हैं चश्मे नम लिए हुए

हेजाज़ से अली के लाल जंग को नहीं गए
चले हैं घर से दश्त में वो इक अलम लिए हुए

यूँ अर्ज़क़े लईन ने शिकस्त खा के ये कहा
हसन का लाल रन में है अली का दम लिए हुए

चचा की आस में सकीना दर पे बैठी रह गई
यूँ हसरतों से तक रही है चश्में नम लिए हुए

हसन का लाल भी नहीं चमन का फूल अब नहीं
हुसैन रन में जा रहे हैं पुश्ते ख़म लिए हुए

बदन का सब लिबास रन में कट गया तो क्या हुआ
खड़ा है खुल्द का लिबास एक जम लिए हुए

ये कौन मश्क ले के जा रहा है अब फेरात पर
सकीना को है नज़र में है वो दम ब दम लिए हुए

हर एक ज़ख़्म पे हुसैन के हज़ारों हैं सलाम
हज़ारों ज़ख़्म जिस्म पे हैं मोहतरम लिए हुए

रक़म करेगा ख़ून से वो कर्बला की दास्ताँ
कलीम ग़म के आंसुओं का है क़लम लिए हुए
9
नूर का नूर है वो जलवा फिगन का वारिस
चश्मे नम रन में है अहमद के चमन का वारिस

ख़ौफ़ खा कर यही कहता है यज़ीदी लश्कर
जोश में इब्ने अली,दिखता है हमको ख़ैबर
रन में आया है अली,शाहे ज़मन का वारिस

प्यास मासूम की बुझने से रही दश्त में अब
मेरी किस्मत में लिखा, तश्ना दहन रहना जब
कितना मज़लूम है उस तश्ना दहन का वारिस

लाश क़ासिम की उठाते हुए कहते हैं हुसैन
हाय ज़ैनब को दिखाते हुए कहते है हुसैन
कौन अब होगा मेरे भाई हसन का वारिस

कर गया भाई मेरा दीने मोहम्मद से वफ़ा
रो के फिर लाशए शब्बीर से ज़ैनब ने कहा
“कौन अब होगा मिरे रंजो मेहन का वारिस”(आबिद सलेमपुरी, मिसरे तरह )

लाश पे लाश है दिल में लिए ग़म जाते हैं
क़ैद हो कर के वो शाम अहले हरम जाते हैं
अब तो कोई नहीं शब्बीर के तन का वारिस

दस्ते आबिद में कलीम ऐसे रसन बांधी है
ग़म की उठती हुई तहद्दे नज़र आँधी है
जैसे बीमार हो जंजीरो रसन का वारिस
10
ऐ रब्बे ज़ुलजलाल मेरे रब्बे ज़ुलजलाल
ग़म से हुआ निढाल तेरे सय्यदा का लाल

जा तो रहे हो दश्त में तन्हा ही छोड़ कर
बाबा न जाओ सूए अदम मुँह को मोड़ कर
किसके सुपुर्द करते हो सुगरा की देख भाल

इक सर्द आह भर के ये कहने लगे हुसैन
मारा गया है जंग में लैला के दिल का चैन
लाशे जवाँ उठाता हूँ पीरी मुझे सँभाल

क़ासिम की लाश है कहीं अकबर की लाश है
अब्बास नामदार की, असगर की लाश है
रक्खेगा कौन ज़ैनब कुलसूम का ख़याल

भैय्या तुम्हारे बाद वो ख़ेमा जलाएंगे
सर नंगे कर के वो हमें दर दर फिराएंगे
ज़िंदा अभी हुसैन है ज़ैनब न कर मलाल

अर्ज़क लईं को दश्ते बला में फ़ना किया
जब सर हसन के लाल ने उसका जुदा किया
हैरत में सब थे देख के क़ासिम की रन में चाल

क़ासिम की मैंने लाश के टुकड़े उठाए हैं
ख़ूँ में नहाए हैं कभी आँसू बहाए हैं
मारा गया था दश्त में जब साहिबे जमाल

सर तूने अहले बैत का तन से जुदा किया
हो कर भी कलमा गो उसी दीं से दग़ा किया
देगा जवाब कैसे लईं होगा जब सवाल

पर्दा नशीं के चेहरे से पर्दा ही ले लिया
प्यासे लबों के रूबरू दरिया ही ले लिया
अंजान थे कि क्या है हराम और क्या हलाल

बाली सकीना क़ैद में ही फ़ौत जब हुई
सय्यदानियों की मौत भी रह रह के तब हुई
कैसे कलीम अब हो बयाँ कर्बला का हाल
11
क्या हाल है बेशीर का कैसी है सकीना
ग़मगीन फ़िज़ा है यहाँ मुश्किल हुआ जीना

आ लौट के आ जा तुझे सुग़रा की क़सम है
है गोद में असग़र मेरा मुझको ये भरम है
मर जाऊं तड़प कर यहां मैं भी तो कहीं ना

बैचैन हूँ बेबस हूँ यहाँ अपने वतन में
मासूम सा इक फूल हूँ ज़ोहरा के चमन में
याद आता है रह रह के मुझे बाबा का सीना

लिक्खा है ये ख़त बाबा ने सुग़रा को लहू से
इस्लाम बचाना है हमें आज
अदू से
अब जामे शहादत हमें कर्बल में है पीना

किस हाल में हूँ बेटी तुझे कैसे बताऊँ
अकबर की शहादत का अलम कैसे सुनाऊँ
कोहराम है बरपा यहाँ मुश्किल हुआ जीना

अब्बास अलमदार के बाज़ू भी क़लम हैं
उस नन्ही सी इक जान पे लाखों ही सितम हैं
इस दश्त में लूटा गया ज़ोहरा का खज़ीना

अकबर की जवाँ लाश पे कुलसूम है रोती
असग़र की शहादत पे जो मज़लूम है रोती
इस्लाम के थे कर्बो बलामें वो नगीना

अब्बास जो होते तो ये मंज़र नहीं होता
हल्कूम पे शब्बीर के ख़ंजर नहीं होता
वीरान हुआ देखो कलीम आज मदीना
12
कर्बल के सुलगते सहरा में सरवर का मुसल्ला छीन लिया
ज़हरा की दुलारी ज़ैनब का मलऊन ने पर्दा छीन लिया

फ़ातेह का अलम तो पाया था तलवार नबी ने बख़्शी थी
ख़ैबर में अली को ख़ुश हो कर दस्तार नबी ने बख़्शी थी
शब्बीर के सर से सजदे में हैदर का अमामा छीन लिया

सब घेर के हमला करते थे, तलवार से तीरो ख़ंजर से
सह रोज़ के प्यासे होकर भी ख़ूँख़ार यज़ीदी लश्कर से
जब हाथ सलामत थे रन में अब्बास ने दरिया छीन लिया

कुबरा भी तड़प कर रोती है, कोहराम है ख़ेमा में बरपा
ये इब्ने हसन का लाशा है,जो शम्सो क़मर का है टुकड़ा
इक रात के दुल्हे कासिम का बद बख़्त ने सेहरा छीन लिया

ज़ैनब ने इजाज़त दे दी है इस्लाम पे जाँ देने के लिए
तलवार लिए हम आए हैं, मामू की रज़ा लेने के लिए
तब औनो मुहम्मद से बढ़कर शब्बीर ने नेज़ा छीन लिया

हाथों में लिये ख़ाली कूज़ा क्यों आस लगाए बैठी है
अब तेरे चचा नहीं आएंगे लैला यही उससे कहती है
अफसोस सकीना बाली से बेदर्द ने कूज़ा छीन लिया

बानो ने जो माँगा पानी तो शब्बीर दिलावर कहते हैं
तुम रह्म की मत उम्मीद करो, सब ख़ून के प्यासे लगते हैं
बेशीर को लेकर जाते ही इक तीर ने बच्चा छीन लिया

जब ख़ौफ़ ख़ुदा का दिल में न हो, उम्मीदे रह्म बेमतलब है
ज़ालिम के तमाचे हैं रूख़ पे और सर से बरहना ज़ैनब है
नामोस के ख़ेमा में जाकर बेशीर का झूला छीन लिया

चाहे रहो दजला पर क़ाबिज़ या लेलो तुम नहरे फ़ुरात
सब देने वाला वो रब है सब पर क़ाबिज़ उसकी ज़ात
जाँ दे कर सरवर ने उनसे जन्नत की सेहबा छीन लिया

अफसोस कलीम अब आँसू भी, शब्बीर के गम में सूख गए
आँखें ही नहीं सब दरिया भी बेशीर के गम में सूख गए
बे दर्द लईनों ने हम से इस्लाम का साया छीन लिया
12

हुसैन तेरी ज़िन्दगी, हुसैन तेरी ज़िन्दगी

सलाम अलैक या नबी सलाम अलैक या अली
हुसैन तेरी ज़िन्दगी हुसैन तेरी ज़िन्दगी

शिकस्ता हाल बेवतन, मगर तू है शहे ज़मन
तू बन्दगी की शान है ये मौत इम्तहान है
हदीसे आख़िरी नबी, हुसैन तेरी ज़िन्दगी

तू पैकरे वफ़ा है तुझसे दीन का विकार है
तू रज़्म गाहे ज़ीस्त का दिलेर शह सवार है
हरम का पासबाँ है तू नबी का राज़दार है
हुसैन तेरे सामने सितम भी शर्मसार है
मिसाले शम्मा दीं रही, हुसैन तेरी ज़िन्दगी

नबी के प्यारे दीन को मिली है तुझसे रौशनी
तेरी रज़ा के नूर से मिटी जहाँ की तीरगी
हमें सबक़ सिखा गयी तेरी अदाए सादगी
नेसार थी तेरे लबों पे कर्बला की तिश्नगी
फ़िदाए शाने दिलबरी, हुसैन तेरी ज़िन्दगी

नमाज़ में हुसैन ने कटा के सर दिखा दिया
कि भूक और प्यास मे भी शुक्र ही अदा किया
जो गम मिले,ख़ुशी से अपनी आँखों में छुपा लिया
पिया भी गर शहीद हो के तूने जामे हक़ पिया
बड़े दुखों में है कटी, हुसैन तेरी ज़िन्दगी

गुलू पे शीर ख़ार के जो ये सितम का तीर है
पेदर की गोद में लहू से तर बतर सग़ीर है
ग़ज़ब है कुम्बए नबी यज़ीद का असीर है
जो ख़ानदान इस जहाँ में अब भी बेनज़ीर है
है इम्तहाने बन्दगी, हुसैन तेरी ज़िन्दगी

न करबला के दश्त में तेरा कोई हबीब है
लईन जो भी है वो तेरी का जान का रक़ीब है
शबीहे आहो ग़म रहे, यही तेरा नसीब है
शिकस्ता साज़ है तेरा, ग़मों की तू सलीब है
अलम की दास्ताँ बनी, हुसैन तेरी ज़िन्दगी

वफ़ा के सजदे में हुआ हुसैन तेरा सर क़लम
ज़मीन आबदीदा है, फ़लक की आँख भी है नम
शहीदे ज़ह्र का अलम तो इक तरफ़ पेदर का ग़म
लहू लहू ये दास्ताँ कलीम कैसे हो रक़म
है अश्क, यासो बेबसी, हुसैन तेरी ज़िन्दगी
14

ज़ंज़ीर है पाऊँ में हांथों में रसन ज़ैनब
ये कैसी हुक़ूमत है ये कैसा चलन ज़ैनब

बीमार ये कहता है हर सिम्त अंधेरा है
मारो न सकीना को इतनी सी तमन्ना है
इस ख़ेमा में होती है अब हमको घुटन ज़ैनब

मासूम सकीना है हैदर की वो पोती है
बाबा की दुलारी है बाबा ही को रोती है
सदमों से है लरज़ीदा ये नन्हा बदन ज़ैनब

शहज़दियां करबल में बेपर्दा हुई बेघर
रोने भी नही देते हैं ये कैसा सितम हमपर
अफसोस यहाँ उजड़ा ज़ोहरा का चमन जैनब

बेगोरो कफ़न लाशें हैं अपने अज़ीज़ों की
रखवाली जो करनी है कर्बल के शहीदों की
जाएगी भला कैसे अब सुए वतन ज़ैनब

पूछेगी जो ये सुग़रा, बाबा हैं कहाँ मेरे
किस हाल में असग़र है, भैय्या हैं कहाँ मेरे
क्या उससे बताएगी ये ख़स्तए तन ज़ैनब

लिल्लाह न मारो अब बीमार है बेपर है
सरवर की निशानी है ये आबिदे मुज़तर है
किस तरह उठाएगी ये रंजो महन ज़ैनब

इस दश्तो बयाबाँ में क़िस्मत ने दिये धोके
शब्बीर की ये बहना मर जायेगी रो रो के
दे पायी न भाई की मय्यत को कफ़न ज़ैनब

देखा न कलीम अब तक दुनिया ने सितम ऐसा
आयी है विदा लेने रुख़्सत तो करो भैया
जाती हैं जुदा होकर भाई से बहेन ज़ैनब
15
तज़केरा तज़केरा तज़केरा
कर्बला का है ये तज़केरा
वाक़या वाक़या वाक़या
ये शहीदों का है वाक़या
फ़लसफ़ा फ़लसफ़ा फ़लसफ़ा
दीन इस्लाम का फ़लसफ़ा
हक़्क़ो बातिल के माबैन था
मामला मामला मामला
अहले बैते बहत्तर का था
क़ाफ़िला क़ाफ़िला क़ाफ़िया
सर कटाने का हर दिल में था
हौसला हौसला हौसला

?तज़केरा तज़केरा तज़केरा
अब शुरु होगया तज़केरा ?

जब मदीने से शाम इब्ने हैदर चले
सुल्ह करने वो आले पयम्बर चले
हाज़िरी क़ब्रे नाना पे देकर चले
तौफ़े काबा का ग़म लेके दिल पर चले
लो सकीना चली, इब्ने शब्बर चले
बीबी ज़ैनब चली, बानो असग़र चले
क़ासिम, अब्बास, सज्जादो अकबर चले
लेके आँखों में ख़ैबर का मंज़र चले
दिल में अरमाँ शहादत का लेकर चले
सर पे बाँधे कफ़न वो बहत्तर चले

काफ़िला क़ाफ़िला क़ाफ़िला
वो चला क़ाफ़िला…..??

दर्स इंसानियत का सिखाते रहे
हक़ परस्ती की बातें बताते रहे
कल्मए हक सदा गुनगुनाते रहे
अपने नाना का वादा निभाते रहे
शाह ख़ेमा से मकतल को जाते रहे
अपने प्यारों की लाशें उठाते रहे
सब्र की इन्तहा वो दिखाते रहे
शिम्र के ज़ोर को आज़माते रहे
रन में बढ़ते रहे तीर खाते रहे
ज़ख़्म खाकर भी वो मुस्कुराते रहे

इन्तहा इन्तहा इन्तहा
सब्र की इन्तहा ??

इब्ने हैदर हूँ मैं कोई आये ज़रा
अपनी ताक़त को वो आज़माए ज़रा
कर्बला में कोई सर कटाए जरा
किसमें कितना है दम ये बताए ज़रा
वो भी अपने लहू में नहाए जरा
ज़ख़्म सीने पे दुश्मन भी खाए ज़रा
हर भरम तोड़ूँ मैदाँ में आए ज़रा
आज इंसानियत वो दिखाए ज़रा
चन्द क़तरे ही दरिया से लाए ज़रा
एक बच्चे को पानी पिलाए ज़रा

?ज़ालिमा ज़ालिमा ज़ालिमा
मत सता ज़ालिमा?

कर्बला में वो जौहर दिखाने लगे
मौजे दरिया पे अब्बास छाने लगे
दुश्मनों के भी दिल थरथराने लगे
मश्क में पानी भर के वो लाने लगे
शिम्र के लश्करी पास आने लगे
अश्क़िया तीर उनपर चलाने लगे
ख़ूँ में अब्बास अपने नहाने लगे
जब कि शब्बीर उनको उठाने लगे
मश्क छेदा हुआ वो दिखाने लगे
शह की आँखों में आँसू भी आने लगे

??कर्बला कर्बला कर्बला
देख ले कर्बला ???

लाश अकबर की देखो उठाए हुसैन
रन से गंजे शहीदाँ में लाए हुसैन
बीबी ज़ैनब को कैसे दिखाए हुसैन
ख़ूँ में लाशे के ऐसे नहाए हुसैन
मुँह से निकले सकीना के हाये हुसैन
ज़ख़्म सीने पे क़ासिम भी खाये हुसैन
रन में बीमार अब कैसे जाये हुसैन
पानी असग़र को कैसे पिलाये हुसैन
एक मासूम भी तीर खाये हुसैन
कोई ऐसी शहादत तो पाये हुसैन

??हुर्मुला हुर्मुला हुर्मुला
रह्म कर हुर्मुला ???

हिल रही है ज़मीं रो रहा है जहाँ
शह के ख़ेमा में जारी है आहो फ़ोग़ाँ
सर से छीना गया जिनके है आसमाँ
कैसे तुझको बताए कि बेबस है माँ
लेके बच्चों को जाये तो जाये कहाँ
कैसे कैसे सितम आज टूटे यहाँ
लेके आई है हमको ये किस्मत कहाँ
कोई लाशा यहां कोई लाशा वहाँ
ख़ेमा जलता रहा हर तरफ़ है धुवाँ
अस्र की हो रही है कहीं पे अज़ाँ

?रब्बना रब्बना रब्बना ?

? हमदोका रब्बना ?

ख़ंजर इब्ने अली पे जो चलता रहा
हल्क़ से ख़ून बाहर निकलता रहा
जिस्म ज़ख़्मों के फूलों से फलता रहा
शिम्र दर पे खड़ा हाथ मलता रहा
जाने किस ख़ौफ़ से वो दहलता रहा
इब्ने साद आज पहलू बदलता रहा
क़त्ल पे ग़म का दरिया उबलता रहा
सारा मैदान शोलों में जलता रहा
ग़म में अफ़सुरदा सूरज भी ढलता रहा
ऐ कलीम अश्क तेरा मचलता रहा
?अल्विदा अल्विदा अल्विदा ?
?ऐ हुसैन अल्विदा?
16
अभी तो क़ासिम बने हो दूल्हा अभी से क्यों रन में जा रहे हो
अभी तो मेंहदी छुटी नहीं है इसे अभी क्यों मिटा रहे हो I

ख़ुमार आँखों में रात का है, उड़ी है रंगत, खुले हैं गेसू
ज़बाने ज़ाहिर से रात का वो हसीं फ़साना सुना रहे हो

है रस्मे दुनिया कि चाहिए था दुल्हन के पहलू में तुम को रहना
पड़ा जो ख़तरे में दीने अहमद तो फ़र्ज़ अपना निभा रहे हो

तुम एक शब के बने थे दूल्हा, वो एक शब की दुल्हन बनी थी
तुम्हारा है इन्तज़ार उस को बताओ रन से कब आरहे हो

हसन के नूरे नज़र भी तुम हो, हसन के लख़्ते जिगर भी तुम हो
अभी तुम्हारी हुई है शादी, लईं को जौहर दिखा रहे हो

हसन को मारा है ज़ह्र देकर, तुम्हे भी मारें गे कर्बला में

तुम अपने कुम्बे के ग़म में क़ासिम अभी से आँसू बहा रहे हो ।

वफ़ा की मेंहदी लगी हुई है, लहू का सेहरा बँधा हुआ है
है दिल पे ख़ंजर, जिगर पे बरछी, तुम अपने ख़ूँ में नहा रहे हो

हसन का ख़ूँ है कलीम रग में, अली से तुम को मिली शुजाअत
शहीद होना है तुम को क़ासिम इसी लिए ज़ख़्म खा रहे हो
17
जामे शहादत की ख़ातिर वो नन्हा सा मेहमान चला है
बानो की आग़ोश की ज़ीनत सरवर का अरमान चला है

सर है कहीं पर तन है कहीं पर ख़ून बहाता मैदाँ में
फ़ौजे यज़ीदी उड़ जाएगी अकबर का तूफ़ान चला है

मर्ज़ी ए हक़ पे हुई शहादत वरना क़ुव्वत किसमें थी
कर्बोबला में दीन कि ख़ातिर होने वो क़ुर्बान चला है

ख़ेमे में हमशक़्ले पयम्बर हाथों में शमशीर लिए
मैदाने करबल में देखो हैदर का बलवान चला है

दश्तेबला में राहे ख़ुदा में जान लुटाने की ख़ातिर
सर पे देखो कफ़न लपेटे करबल का जीशान चला है

ख़ूने हसन है रवां रगों में क़ासिम की हिम्मत तो देखो
हक़ पर जान फ़िदा करने अब तो अम्मू की जान चला है

हांथो में शमशीर लिए मैदान की ज़ानिब वो देखो
बाली सकीना सिसक रही है अम्मा के अरमान चला है

दुनियां की तारीख़ ने अब तक ऐसी शहादत देखी नही
दीने नबी पर कर के देखो बहुत बड़ा एहसान चला है

रोक कलीम अब अपने कलम को दर्द से सीना फटता है
कर्बोबला में सर को कटाने कर्बल का सुल्तान चला है
18
जब कर्बला में हो गया बेशीर पाश पाश
ये देखते ही हो गई दिलगीर पाश पाश

टुकड़े पड़े हैं दश्त में क़ासिम की लाश के
इक रात की दुल्हन की है ताबीर पाश पाश

बाज़ू कहीं है, धड़ है कहीं और सर कहीं
अब्बास के है सीने में शमशीर पाश पाश

अकबर जवां की लाश भी क़ासिम की लाश भी
हसनो हुसैन की हुई जागीर पाश पाश

बरछी के ज़ख़्म खा के पड़ा है ज़मीन पर
हम शक्ले मुस्तफ़ा की है तस्वीर पाश पाश

सर से रिदा जो छिन गई बाज़ारे शाम में
है सय्यदा का दामने ततहीर पाश पाश

बीमार को भी ऐसे सज़ा मिलती है कहाँ
शर्मिंदगी से हो गई ज़ंजीर पाश पाश

नेज़े पे कर्बला में चढ़ा जब सरे हुसैन
बुनियाद सिद्क़ की हुई तामीर पाश पाश

जब कर्बला ही ख़ूने सितम से हुआ है तर
क्यूँ कर न हो “कलीम” की तहरीर पाश पाश
सिद्क़..صدق =سچائی
सिद्क़ सादिक सिद्दीक सिद्दीकी सिदाकत वगैरह लफ़्ज़ सिद्क़ से बने हैं
20
शब्बीर का लश्कर या अल्लाह
तादाद बहत्तर या अल्लाह
ये ज़ुल्म का मंज़र या अल्लाह
है सर पे सितमगर या अल्लाह
हाथों में है ख़ंजर या अल्लाह
कटता है मेरा सर या अल्लाह
मै बेकसो बेपर या अल्लाह
हूँ सिब्ते पयम्बर या अल्लाह
तू शाफ़ए महशर या अल्लाह
अब रह्मो करम कर या अल्लाह ???

ये टूटे दिलों को जोड़ेंगे
ना सब्र का दामन छोड़ेंगे
रुख़ तूफानों का मोड़ेंगे
हर हाल अदू को तोड़ेंगे
?
ये आले पयम्बर या अल्लाह?

हर सू से लपकती शमशीरें
फिर भी है लबों पे तक़बीरें
तारीख़े वफ़ा की तहरीरें
फ़िरजाने अलम की तस्वीरें
?ये दीन के पैकर या अल्लाह?

हर सिम्त उठी तलवारे हैं
खंजर की कहीं झंकारे हैं
सौ तीरों की बौछारे हैं
इक जान पे सौ यलगारे हैं
?नरगे में है अकबर या अल्लाह?

सूरज सा दमकता सहरा है
और प्यास से उतरा चेहरा है
गो पास ही बहता दरिया है
शह रोज़ से फिर भी प्यासा है
?छः माह का असग़र या अल्लाह?

ग़ैरत भी कहाँ तक हाँथ मले
मासूम तिज़ारत खाक़ तले
बाज़ू है कलम पर साथ चले
मश्किजा लिए दरिया पे चले
?अब्बास दिलावर या अल्लाह?
मक्कार हिमाक़त क्या जाने
साहाने हुक़ूमत क्या जाने
फरमाने रिसालत क्या जाने
शब्बीर की अज़मत क्या जाने
?वहसी है सितमगर या अल्लाह?
लाशें हैं पड़ी बेगोरो कफ़न
तराज हुआ ज़ोहरा का चमन
चेहरों पे है सबके लाशे गुहन
बाज़ू है कटे ऐ सदके रसन
?बीमार है बेपर या अल्लाह?
होंठों पे है मेरे प्यास अभी
आएंगे चचा अब्बास ज़री
रखती है सकीना आस यही
बाकी है कलीम अहसास अभी
?सब हो गए बेघर या अल्लाह
21
घर भी नहीं, असग़र भी नहीं मेरा कितना बुरा नसीब है
याद सताए या मौला

ऐ अकबर मेरे ऐ सरवर अब ग़म ही मेरा हबीब है , याद सताए या मौला

तड़प तड़प के जान गँवा दी मगर मिला न पानी
लहू बहा के आले अबा की ये कैसी मेहमानी
बताओ ये कैसी मेहमानी
आ जाओ मुझे ले जाओ ये शिम्रे लईं रक़ीब है
याद सताए या मौला

बिछड़ के मुझसे कहाँ करेगा मेरा लाल बसेरा
तेरे सिवा अब इस दुनिया में कोई नहीं है मेरा
बता दे कोई नहीं है मेरा
ये दुखिया मेरे मन बसिया तेरी माता बड़ी ग़रीब है
याद सताए या मौला

रूठ के मुझ से चला गया है मेरे नयन का तारा
तीरे सितम से कर्बल बन में तुझे लईं ने मारा
गले पे तुझे लईं ने मारा
इस दुनिया से उस दुनिया तेरा जाना बहुत अजीब है
याद सताए या मौला

ज़बाँ ज़बाँ पे कलीम तेरा ये नौहा है छाया
सदा के बिछड़े माँ बेटे का दर्द सुनाने आया
है उनका दर्द सुनाने आया
ये दिलबर मासूम असगर मेरे दिल के कहीं करीब है
याद सताए या मौला
22
ढूँड रही है प्यारे चचा को बाली सकीना चुपके से
देख न ले वो मेरी सूरत शिम्र कमीना चुपके से

दरिया पे अब्बास गये हैं आए नहीं लेकर पानी
काश कि मेरे पास आ जाती मोजए दरिया चुपके से

कहाँ गया मेरा नन्हा भैया, रोती और बिलकती है
दर दर ढूँड रही असग़र को प्यारी बहना चुपके से

पूछ रही है बाली सकीना रन से बाबा क्या लाए हैं
लेकर काँधे पर आए क़ासिम का लाशा चुपके से

सोच में बाबा की सोग़रा, बीमार पड़ी है बिस्तर पर
छोड़ के मुझको चले गए मेरे प्यारे बाबा चुपके से

लौट के अब नहीं आने वाला, असग़र को रोती है ज़ैनब
जाके बाबा की गोदी में सोया होगा चुपके से

एक फ़लक पे सदा चमकता, एक ज़मीँ पे असगर है
जैसे झूले में आया हो चाँद का टुकड़ा चुपके से

कर्ब सकीना का अब तुम से कैसे बताए हाय कलीम
सुन के आँसू आजाता है तेरा नौहा चुपके से
23
सानिये महशर या हैदर कर्बो बला का ये मंज़र
लाशो लहू ताहद्दे नज़र तेग़ सिपर बरछी ख़ंजर

आले नबी गुलहाय चमन पाबा रसन और तशना दहन
याद जब उनकी आती है चोट सी लगती है दिल पर

इब्ने अली हैं सजदे मैं लाश पड़ी है क़ासिम की
नह्र पे हैं अब्बास पड़े सोते हैं ये असग़र अकबर

सर हैं कहीं बाज़ू हैं कहीं जिस्म कहीं तो पैर कहीं
ख़ून का दरिया बहता है सारे शहीदाँ हैं बेसर

यूँ तो सभी थे कलमा गो दिल में मगर ईमान न था
ताजो हुकूमत की ख़ातिर तेग़ बकफ़ थे अहले शर

नाम है बाप और बेटे का एक है ग़ाज़ी एक शहीद
इब्ने अली से कर्बल है और अली से है ख़ैबर

ख़ूने मक़द्दस के ग़म में काँप रहा है सेहरा भी
रन में पड़ा बेगोरो कफ़न शेरे ख़ुदा का नूरे नजर

दिल में शहीदों का ग़म है आँख में आँसू हाय कलीम
कोई न उनका वारिस है आले मुहम्मद हैं बेघर
24
जलवा फ़ेगन था चेहरए अनवर तमाम रात
पढ़ते रहे नमाज़ ही अकबर तमाम रात
या
सजदे में थे जो नायबे हैदर तमाम रात
मशगूल थे नमाज़ में अकबर तमाम रात

ऐ मोमिनों ये रात शहादत की रात थी
सहमा हुआ था ख़ौफ़ का मंज़र तमाम रात

गरमीये रेगज़ार में शिद्दत की प्यास से
बेचैनो बेक़रार था असगर तमाम रात

कर्बल से भाग जाए न ये कुम्बए अली
पहरे पे था यज़ीद का लश्कर तमाम रात

उम्मत का ग़म था क़ल्ब में, होटों पे थी दुआ
रोते रहे सजूद में सरवर तमाम रात

बच्चों की भूक प्यास पे अब्बास रो पड़े
तस्वीरे ग़म था सब्र का पैकर तमाम रात

ज़ैनब बहुत उदास थी भाई की फ़िक्र में
बैठी हुई थी ख़ेमा के बाहर तमाम रात

दुश्मन कहीं न मार दे शब ख़ून ऐ कलीम
बेदार था रसूल का दिलबर तमाम रात
25
शेरे ख़ुदा का आज है दिलबर लहू लहू
अब्बास हैं लहू लहू, अकबर लहू लहू

लब पे दुआ है, दस्त में शमशीरे हैदरी
देखे कोई हुसैन की तस्वीरे दिलबरी
शब्बीर का है चेहरए अनवर लहू लहू

थर्रा के देखा बाप ने जब आसमान को
पानी के बदले तीर मिला बेज़ुबान को
है गोद में हुसैन के असग़र लहू लहू

लादे कोई तो नूरे नज़र, पुर जमाल को
लख़्ते जिगर को, बानुए बेकस के लाल को
फिरती है माँ तलाश में दर दर लहू लहू

लेने पे हैं तुले हुए सब उस की जान को
इंसानियत सिखाई थी जिसने जहान को
उसके ही तन पे आज है खंजर लहू लहू

मैदान अहले बैत की लाशों से है पटा
तन है कहीं पड़ा हुआ, सर है कहीं पड़ा
कर्बो बला का आज है मंज़र लहू लहू

सोचा न था जिसे कभी, वो आज हो गया
रो कर ‘कलीम’ ज़ैनबे दिलगीर ने कहा
कर्बल ने कर दिया है मुक़द्दर लहू लहू
26
कर्बला में सैयदे अबरार बाक़ी है अभी
कट गया है सर तो क्या दस्तार बाक़ी है अभी

कौन है मर्दे मुजाहिद, सब पता चल जाएगा
फ़ातहे ख़ैबर की वो तलवार बाक़ी है अभी

आख़िरी इक जंग बातिल से ज़रूरी है यहाँ
नारए तकबीर की यलग़ार बाक़ी है अभी

लाख हो तूफ़ाने दरिया, सामना कर लेंगे हम
आबिदे बीमार की पतवार बाक़ी है अभी

फिर बना लेंगे नशेमन शाख़े गुल पर देखना
चन्द हैं तिनके तो क्या मेमार बाक़ी है अभी

ये भी सच है हम बहत्तर हैं मगर बुज़दिल नहीं
कुछ न कुछ अस्लाफ़ का किरदार बाक़ी है अभी

ग़म नहीं, क़ासिम नहीं अब्बासो अकबर भी नहीं
कट गया कुम्बा तो क्या सालार बाक़ी है अभी

जब भी चाहे इम्तहाँ लेले हमारे सब्र का
दिल में अपने जज़्बए ईसार बाक़ी है अभी

एक सर से भी हज़ारों सर यहाँ बन जाएंगे
जंग में इस्लाम का सरदार बाक़ी है अभी

काट कर रख देगी रन में सर यज़ीदों का ‘कलीम’
ज़ुल्फ़ेक़ारे हैदरी में धार बाक़ी है अभी
27
आले नबी का आज है गुलशन लहू लहू
हद्दे नज़र है सब्र का मसकन लहू लहू

कर्बल में तोड़ डाला है ज़ालिम ने हर सितम
तीरे जफ़ा से फूल सा है तन लहू लहू

आई है कैसी सर पे मुसीबत की ये घड़ी
है अकबरे दिलेर का बचपन लहू लहू

पानी के बदले तीर से ज़ालिम ने जो किया
उस ज़ुल्म से हुसैन का है मन लहू लहू

कुर्बान कुम्बा हो गया इस्लाम के लिए
आले नबी का है रुए रौशन लहू लहू

सादिक़ हुई हदीसे नबी कारज़ार में
काबा की है फ़सील का दर्पन लहू लहू

सुग़रा भी सबकी याद में रोती है ज़ार ज़ार
बच्ची के आँसुओं से है आँगन लहू लहू

देते थे जिसको बोसा नबी एहतराम से
शब्बीर की है आज वो गर्दन लहू लहू

आँसू रवाँ हैं चश्म से यादे हुसैन में
क्योंकर न हो ‘कलीम’ का दामन लहू लहू
28
चलती है अब हुसैन पे शमशीर हाय हाय
रोती है दर पे ज़ैनबे हमशीर हाय हाय

जा तो रहे थे शाम वो मिलने यज़ीद से
कर्बल में शह को लाई है तकदीर हाय हाय

अब्बास क़त्ल हो गये पानी के वास्ते
काम आ सकी न कोई भी तदबीर हाय हाय

पानी के बदले तीर मिला बेज़बान को
दम तोड़ता है गोद में बेशीर हाय हाय

वो नौजवान शेर था अट्ठारह साल का
अकबर है या रसूल की तस्वीर हाय हाय

क्या ख़ूबरू जवान वो होता सग़ीर भी
लगता न उसको आ के अगर तीर हाय हाय

असग़र का ग़म हुसैन का ग़म सारे घर का ग़म
रोती है आज बानुए दिलगीर हाय हाय

ख़ंजर बकफ़ लईन है अब सीने पर सवार
दम भर में कट गया सरे शब्बीर हाय हाय

जाते हैं सूए शाम असीराने कर्बला
पाबा रसन हैं हाथ में ज़ंजीर हाय हाय

इस्लाम दीं का सबसे बड़ा वाक़या है ये
रोए न क्यों कलीम की तहरीर हाय हाय
29
अजीब जंग का मंज़र दिखाई देता है
जलालो ग़ैज़ में अकबर दिखाई देता है

दिखाए रंग अगर ख़ूने हाशमी अपना
हर एक फ़र्द ही हैदर दिखाई देता है

जवान होता तो अल्ला जाने क्या होता
जो तिफ़्ल सब्र का पैकर दिखाई देता है

वली भी तड़पें गे इस दर्जए शहादत को
सरे हुसैन सिनाँ पर दिखाई देता है

बना है ख़ुल्द में घर अहले बैत का लेकिन
अगरचे कुम्बा ये बेघर दिखाई देता है

गले पे तीरे सितम शीर ख़्वार के है है
लहू लहू अली असगर दिखाई देता है

हर एक फ़र्द को है आरज़ू शहादत की
हर एक ज़ब्त का यावर दिखाई देता है

कभी जब आती है तलवार दस्ते अकबर में
तो कर्बला दरे ख़ैबर दिखाई देता है

हसन का लाल भी काम आ गया है रन में कलीम
ये कर्बला है कि महशर दिखाई देता है
31
ज़ैनब ये कह रही है, ये रात आख़िरी है
छोटी सी ज़िन्दगी है, ये रात आख़िरी है

मायूस चाँदनी है, ग़मगीन हैं नज़ारे
नागाह कर रहे हैं सब मौत के इशारे
रन में शहीद होंगे ये रंजो ग़म के मारे
कर्बल में कल बहेंगे हर सू लहू के धारे
ये दिन भी आख़िरी है, ये रात आख़िरी है

मैदाँ में इब्ने हैदर सजदे में रो रहे हैं
दर पे लिये मुसल्ला अब्बास भी खड़े हैं
अकबर नमाज़े हक़ से फ़ारिग़ अभी हुए हैं
अहले हरम के बच्चे भूके ही सो गये हैं
खेमा में बेकली है, ये रात आख़िरी है

खंजर रवाँ है उसपे जो फूल सा बदन है
जो है ख़िज़ाँ रसीदा ज़ोहरा का वो चमन है
है तौक़ हर गले में और हाथ में रसन है
जो लाश भी पड़ी है, बे गोर बेकफ़न है
कैसी सितम गरी है, ये रात आख़िरी है

नेज़ों पे सर चढ़े हैं लरज़ीदा हैं फ़ज़ाएं
हर सिम्त है लहू और हर सिम्त हैं बलाएं
सैदानियों को मंज़र ये कैसे हम दिखाएं
रो रो के कह रही हैं क्या है मेरी ख़ताएं
कैसी ये बेबसी है, ये रात आख़िरी है

हर नाबकार ज़ालिम नेज़ा लिए खड़ा है
अहमद का है नवासा सजदे में जो पड़ा है
सीने पे शाहे दीँ के शिम्रे लईँ चढ़ा है
है है ‘कलीम’ खंजर हलक़ूम पे धरा है
कैसी ये बेकसी है, ये रात आख़िरी है
32
असग़र की नब्ज़ देख के मादर ने रो दिया
तिश्नालबी पे आले पयम्बर ने रो दिया

ग़म से निढाल बाली सकीना की प्यास पर
अब्बास जैसे शेर दिलावर ने रो दिया

अहले हरम को प्यास से बेहाल देखकर
बेरह्म नाबकार सितमगर ने रो दिया

रूख़्सत को आया जिस घड़ी बाँधे हुए कमर
जाकर लिपट के बाप से अकबर ने रो दिया

अकबर के मारे जाने की जब आयी है ख़बर
ख़ेमा में धाड़ें मार के घरभर ने रो दिया

असग़र तो अब न आएं गे झूला उतार लो
ये कह के बीबी बानुए मुज़तर ने रो दिया

आख़िर में जब हुसैन हुए घोड़े पर सवार
बेअख़्तियार ज़ैनबे बेपर ने रो दिया

सीने पे जब हुसैन के शिम्रे लईं चढ़ा
नाज़ुक गले को देख के ख़ंजर ने रो दिया

लाशें पड़ी हुई थीं बयाबाँ में जा बजा
कर्बो बला में ख़ून के मंज़र ने रो दिया

सजदे में जब हुसैन का सर कट गया कलीम
जन्नत में छाती पीट के हैदर ने रो दिया
33
सब्र करो ऐ आले पयम्बर सब्र करो
सब्र करो ऐ सब्र के पैकर सब्र करो

ख़ेमा पर दो चार गिरे हैं तीर आकर
कोई निकल के जाए न ख़ेमा से बाहर
ज़ुल्म पे है आमादा सितम्गर सब्र करो

तीन दिनों से पानी से महरूम हैं ये
फ़ाक़े से हैं बेकस हैं मज़लूम हैं ये
सोने को अब है ख़ाक का बिस्तर सब्र करो

चारों तरफ़ है शिम्र का पहरा ऐ बेटा
ख़ाली पड़ा है सुब्ह से कूज़ा ऐ बेटा
सोचो ज़रा मजबूर है मादर सब्र करो

हम न हों तो आज अकेले रह लेना
सीने पे हर तीरे सितम्गर सह लेना
नूरे नज़र शब्बीर के दिलबर सब्र करो

किससे कहें क़िस्मत में तबाही लिक्खी थी
ख़ैर यही मरज़ीये इलाही लिक्खी थी
रूठ गया है हम से मुक़द्दर सब्र करो

कोई नहीं सुनसान बयाबाँ में अपना
कोई नहीं है है शह्रे ख़मोशाँ में अपना
अहले हरम अब होगए बेघर सब्र करो

आज अगर अब्बास नहीं शब्बीर नहीं
क़ासिमो अकबर भी तो नहीं बेशीर नहीं
वक़्त पड़ा है ज़ैनबे मुज़तर सब्र करो

ज़िन्दा रहने की ख़ाहिश नादानी है
कुछ भी करलो मौत तो इक दिन आनी है
मारे गये हैं असग़रो अकबर सब्र करो

ग़म में कलीम इस तरह से कब तक रोओगे
अश्के अलम से कब तक दामन धोओगे
ज़ख़्म दिये तकदीर ने दिल पर सब्र करो
34
फूल सा तन वो तश्ना दहन, शब्बीर की आँख का तारा है
ख़ेमए शाह में असग़र की प्यास पे बेकल दरिया है

इस दश्ते बला में तबाही है,
चेहरे पे सभी के उदासी है
मासूम सकीना प्यासी है,
हर सिम्त यहां ख़ामोशी है
बच्चे के लिए माँ रोती है, कोहराम यहाँ पर बरपा है

तीरों के निशाँ और ख़स्ता बदन
पामाल हुआ ज़ोहरा का चमन
है सर तो यहां कहीं और है तन,
लाशें हैं पड़ी बेगोरो कफ़न
है तौक़ गले में आबिद के, और ज़ंजीरों में जकड़ा है

शब्बीर फ़क़त कोई नाम नहीं,
डर जाना इसका काम नहीं
इस वक्त है गरचे तश्ना लबी,
बाज़ू में अभी है ज़ोर वही
इस्लाम का ये तो शैदा है, जो शेरे ख़ुदा का बेटा है

ऐ शिमरे लईं तू क्या जाने,
न क़ुव्वत इसकी पहचाने
इस्लाम के हैं ये दीवाने,
आये हैं तुझी से टकराने
अब ख़ून से होगी सुर्ख़ ज़मीं,लरज़े में सितम का सेहरा है

है दीन पे ये एहसान किया
शब्बीर ने सब क़ुर्बान किया
जब मौत को भी मेहमान किया
रब का पूरा फ़रमान किया
होंटों पे है उम्मत की दुआ, और सुर्ख़ लहू से चेहरा है

तस्नीम भी जिनसे दूर नहीं
ताक़त पे कभी मग़रूर नहीं
भूके हैं तो क्या माज़ूर नहीं
हर शय के लिए मजबूर नहीं
ये मरज़ीये रब है कर्बल में इस वास्ते कुम्बा प्यासा है

हैं अहले हरम महरूम यहाँ,
काटा जो गया हलक़ूम यहां
अब क़ैद में हैं मज़लूम यहाँ
ये मौत भी है मग़मूम यहाँ
बस रोक कलीम अब अपना कलम तेरे साथ ज़माना रोता है
35
तीन दिनों से प्यासा था जो, नन्हा असग़र याद आया
जाम जो देखा पानी का, वो फूल सा पैकर याद आया

आँखें रोये, दिल भी रोये, रोऊँ मैं सुब्हो शाम यहां
जब भी मुझको कर्बो बला का खूनी मंज़र याद आया

ग़श खाकर गिर जाती थी मज़लूम सकीना नन्ही सी
होश में वो बाबा का अमामा जब ख़ूँ से तर याद आया

जलवा फ़ेगन अकबर को देखा जब कर्बल के मैदाँ में
ज़ैनब को नागाह नबी का चेहरए अनवर याद आया

ज़िन्दाँ में थी क़ैद सकीना, आबिद था बीमार बहुत
क़ैद में बीबी ज़ैनब को हैदर का दिलावर याद आया

गंजे शहीदाँ में अपना सर पीट के ज़ैनब रोती थी
एक बहेन को भाई का जब कटा हुआ सर याद आया

शाम से अब रुख़्सत होकर, जाती है मदीना को ज़ैनब
अश्क भरे हैं आँखों में, वो रुए बहत्तर याद आया

अहले हरम पे जो बीती है कैसे लिखे रंजीदा कलीम
देख के मंज़र कर्बो बला का सानिये महशर याद आया
36
हश्र में रब से रो रो कर मासूम का झूला बोलेगा
काँप उठेगा अर्श भी जब सह रोज़ का प्यासा बोलेगा

शाह का कुम्बा एक तरफ़ था एक तरफ़ थी फ़ौजे यज़ीद
ज़ुल्म हुआ था आले नबी पे अर्शे मुअल्ला बोलेगा

क़त्ल हुए हमशक्ले पयम्बर सानिये हैदर हाय हुसैन
अहले हरम की मज़लूमी पे आज भी काबा बोलेगा

इश्क़े ख़ुदा में क्या होता है आज ये दुनिया देखेगी
तलवारों के साये में शब्बीर का सजदा बोलेगा

देख के लाशा असग़र का ये कहने लगी माँ रो रो कर
तीरे सितम से ख़ून में तर बेशीर का कुर्ता बोलेगा

कट के गिरे अब्बास के बाज़ू मशकीज़ा भी छलनी है
बाली सकीना की शिद्दत की प्यास पे दरिया बोलेगा

ज़ुल्मो सितम जिस तरह सहा था आले पयम्बर ने रन में
ख़ून में डूबा कर्बो बला का आज भी सैहरा बोलेगा

इब्ने अली शब्बीर के ग़म में है जो बहुत ग़मगीन कलीम
अहले अज़ा की महफ़िल में हर सू तेरा नौहा बोलेगा
37
ये कौन दुलदुल पे आ रहा है
ये बर्क़ है या कोई कज़ा है

हुसैन इब्ने अली है ये तो
ज़माने भर की यही ज़या है

यही है ज़हरा का लाल जिसने
नबी का वादा निभा दिया है

यही है शेरे खुदा का बेटा
रगो मे जिसके वही अना है

वो रन में अकबर भी जा रहे हैं
सभी से इनका हुनर जुदा है

लहू लहू है ज़मीने करबल
ज़मीं है बरहम हवा ख़फ़ा है

कहीं पे ज़ैनब भी रो रही है
खुला है सर और छिनी रीदा है

यहां सकीना की छिनी बाली
कोई बताय खता भी क्या है

था चांद जैसा मेरा ये असग़र
गला क्यों तीरों से छिद गया है

ये जान जाये तो ग़म न करना
अली के घर की यही सदा है

कलीम दावा ये कर रहे है
हुसैन दिल में मेरे बक़ा है
38
ये ख़त में लिखती है सुग़रा कहाँ हो तुम बाबा
है देखने की तमन्ना कहाँ हो तुम बाबा

की याद आती है मुझको बहुत ही असग़र की
है कैसी मेरी सकीना कहाँ हो तुम बाबा

यहाँ पे कोई बताता नहीं है कुछ मुझको
न रह सकूँगी मैं ज़िन्दा कहाँ हो तुम बाबा

ये नींद आती नही मुझको ख़ाक बिस्तर पर
मैं ढूंढती रही सीना कहाँ हो तुम बाबा

कदम क़दम तुम्हारी सताती यादें हैं
मैं बन रही हूं तमाशा कहाँ हो तुम बाबा

लहू लहू मेरी आँखें हैं कैसे देखूं मैं
है दिल में अब तो अंधेरा कहाँ हो तुम बाबा

सताती याद है मुझको बहुत ही अकबर की
की बहता आँख से चश्मा कहाँ हो तुम बाबा

ये आप से मेरा शिकवा है छोड़ कर मुझको
चले गए हो क्यों तन्हा कहाँ हो तुम बाबा

ये ख़त को पढ़ते ही देखा है हाल सरवर का
की मुँह को आया कलेजा कहाँ हो तुम बाबा

कलीम कैसे बताऊं मैं हाल सुग़रा का
रुकेना आंख का दरिया कहाँ हो तुम बाबा
39
देखो मैदां में सिब्ते पयम्बर चले
ले के हांथो में असग़र को सरवर चले

रन में दादा के ज़ौहर दिखाएंगे वो
सुए मैदान खेमा से अकबर चले

अल अतश जब सकीना ने रो कर कहा
मश्क़ दरिया पे ले के दिलावर चले

क़ैदी ज़िन्दा से जिस दम रिहाई हुई
आंख में अहले बैत अश्क़ भर कर चले

रन में होती रही तीर की बारिशें
जिस्मे अतहर पे हर सू से खंज़र चले

देखो आले पयम्बर को तुम भी कलीम
दीन पर अपना सब कुछ मिटा कर चले
40
सुग़रा ने खत में लिख दिया बाबा सलाम है
कर दीजिएगा अब दुआ बाबा सलाम हैं

असग़र के साथ याद सकीना की आई है
दोंनो के वास्ते मिरा बाबा सलाम है

अकबर के साथ ज़ैनब ओ कासिम भी आये याद
सबको सलाम है मिरा बाबा सलाम है

तन्हा मुझे यूँ छोड़ गये आप किसलिये
कहना वहाँ पे ऐ हवा बाबा सलाम है

नहरे फुरात रो पड़ी ज़ालिम के ज़ुल्म पर
कहता है तुमको करबला बाबा सलाम है

दीने नबी के आप मुहाफि़ज़ हैं बा खुदा
हक़ पे ही होगा फैसला बाबा सलाम है

सुगरा का हाल कौन बताये उन्हे कलीम
अश्कों ने मुझसे ही कहा बाबा सलाम है
41
ज़मीं पे शाह का सजदा गले पे खंजर है
लहू में डूबा है चेहरा गले पे खंजर है

ये कह के ज़ैनबे दिलगीर रो पड़ी मौला
गला हुसैन का काटा , गले पे ख़ंजर है

उठो की बाली सकीना की जान जाती है
ये कैसी प्यास है बाबा, गले पे ख़ंजर है

सितम किया है लाईनों ने आज करबल में
बहुत उदास है काबा, गले पे ख़ंजर है

इरादतन हैं खड़े सब लईन साहिल पर
रखो हुसैन को प्यासा ,गले पे ख़ंजर है

बयान करती है बाली सकीना रो रो कर
शहीद हो गए बाबा, गले पे ख़ंजर है

बयान कैसे करूँ हाल इब्ने हैदर का
लहू से भर गया सीना ,गले पे ख़ंजर है

लहू के आंसू बहेंगे कलीम आंखों से
लिखोगे जब कभी नौहा,गले पे ख़ंजर है
42
आये हैं कर्बोबला में सर कटाने के लिए
इस जहाने आबो गिल में हक़ बताने के लिए

दीन पर नाना के चलना है यही बस ज़िन्दगी
मौत की हिम्मत नहीं उनको डराने के लिए

बेबसी जैनब की कैसी शाम के बाज़ार में
कोई भी पर्दा नहीं है रूख छुपाने के लिए

आंच आई दीन पर पीछे न होंगे हम कभी
दिल से हम तैयार होंगे उस ज़माने के लिए

है लहू अब्बास के तन में अली का देख लो
जा रहे हैं नहर पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए

नौजवाँ क़ासिम के डर से फौजे बातिल कह रही
कौन होगा अब मुक़ाबिल सर कटाने के लिए

हो गई थी जब शहादत अकबर ए ज़ीशान की
रन में सरवर ही गये लाशा उठाने के लिए

सर ब सजदा हो के करता है दुआ इतनी कलीम
ग़म हो इस दिल में मोहम्मद के घराने के लिए
43
करबल की सरज़मीन तेरी जुस्तजू हुसैन
वहदानियत की दिल में लिए आरज़ू हुसैन

कूफ़ा के सानिहा की खबर क्या सुनाऊं मैं
मुस्लिम शहीद हो गये हैं बा वज़ू हुसैन

जिसको नबी ने नाज़ से पाला था या खुदा
इस दीने मुस्तफा की बने आबरू हुसैन

जब बेजुबाँ को लेके गए थे क़रीबे फ़ौज
आदा से क्या हुई थी वहां गुफ्तगू हुसैन

दर पे खड़ी बचश्मे नम दिलगीर ने कहा
कुम्भला रहा है लख्ते जिगर खूबरू हुसैन

अकबर को देख चौंक गए इसकदर अदू
बिल्कुल रसूल जैसे लगे हू ब हू हुसैन

अब्बास चल पड़े तो ये हमशीर ने कहा
पहरे पे रात दिन हैं खड़े अब अदू हुसैन

मैदां में जाएं हुर ये इजाज़त हुसैन दें
सजदे में सर कटाऊं यही आरजू हुसैन

महशर के रोज़ ये मेरा अरमान है कलीम
दीदार आप का मैं करूँ रूबरू हुसैन
44
कैद में रोती रही बाली सकीना रात भर
थी उसे बाबा के सीने की तमन्ना रात भर

आबिदे मुज़्तर के तन पे हैं जो दुर्रों के निशाँ
बह रहा है ख़ूने दिल बन कर पसीना रात भर

खेम ए अतहर में थी यूँ हर तरफ ही बेबसी
था बहुत बेचैन अहमद का नवासा रात भर

बेकफन लाशें पड़ी थीं कर्बला में हर तरफ
ख़ून में डूबे हुए थे सारे शोहदा रात भर

है मेरे बाबा कहाँ ये कह के वो रोती रही
याद उसे आता रहा बाबा का सीना रात भर

नींद उसे काँटों भरे बिस्तर पे कैसे आएगी
देते हैं ज़ालिम मरीज़ों को भी ईज़ा रात भर

सोचती ज़ैनब यही कब क़ैद से होंगे रिहा
उसकी नज़रों में रहा प्यारा मदीना रात भर

पास झूले के सकीना बस यही कहती रही
बेबसी देखी नहीं जाती है बाबा रात भर

रोती थी ज़ैनब सकीना की ये हालत देख कर
मारते थे गाल पे ज़ालिम तमाचा रात भर

दास्ताने ज़ुल्मों दहशत हो बयाँ कैसे कलीम
दीदए पुरनम रहा ग़मगीन काबा रात भर
45
तारीख़ में दुनियाँ की ये लश्कर नहीं देखा
इक जंग में शोहदा हों बहत्तर नही देखा

बच्चों को लहू में यूं कभी तर नहीं देखा
तारीख़ ने ऐसा कभी मन्ज़र नहीं देखा

इस जज़्बा ए ईसार पे कुर्बां अली अकबर
मैदां में उतर आये तो मुड़ कर नहीं देखा

हमश्क़्ले पयम्बर की शहादत हुई जैसे
टूटा हुआ दिल में कहीं खन्ज़र नहीं देखा

जंजीरों में जकड़ा हुआ बिमार ये बोले
मैंने कभी ज़ैनब को यूँ मुजतर नहीं देखा

जलवा तुझे खैबर का नज़र आयेगा बतिल
मैदान में तूने अली अकबर नहीं देखा

छह माह के बच्चे को जुदा कर तो दिया पर
उस माँ ने दोबारा अली असगर नहीं देखा

कुर्बान मेरी जान उसी तिश्नादहन पर
मासूम सकीना सा वो पैकर नहीं देखा

सरवर की शाहादत पर ये आबिद ने कहा था
ऐसा कभी नेज़े पे कोई सर नहीं देखा

सोती थी सकीना जो कभी सीनए शह पर
काँटों भरा उसने कभी बिस्तर नहीं देखा

कर्बल में जो शब्बीर के हमराह थे यारों
दुनियां की निगाहों ने वो लश्कर नहीं देखा

इक जंग में हैं पीर,जवाँ,नन्हा सा असगर
तारीख़ के सफहों ने ये गौहर नहीं देखा

कहता है कलीम आज ये अब्बासे वफा पर
दुनियाँ ने कहीं ऐसा दिलावर नहीं देखा
46
जाती हैं शाह ज़ादियाँ बाज़ारे शाम में
तोड़ी गयी हैं चूड़ियाँ बाज़ारे शाम में

रुख़्सार से सकीना के हर ज़ख़्म है अयाँ
इंसानियत के अब वो अलमदार हैं कहाँ
पा में बँधी हैं रस्सियाँ बाज़ारे शाम में

चादर भी जिसके सर से उतरती न थी कभी
ज़ुल्फ़ो में अपना चेहरा छुपाए वो चल पड़ी
तन पे हया के बरछियाँ बाज़ारे शाम में

रोते थे हाल देख के बाशिन्दगाने शाम
बिन्ते अली असीर है, ज़ैनब है जिसका नाम
दिल पर सितम की बिजलियाँ बाज़ारे शाम में

क़ैदी बना है क़ाफ़िला आले रसूल का
हैरान सारे लोग थे ये क्या है माजरा
हाय नबी की बेटियाँ बाज़ारे शाम में

आँखों में अश्क चेहरए अनवर बुझा बुझा
गेसू खुले हैं सोग में सर पे न है रिदा
आहो बुका है, सिसकियाँ बाज़ारे शाम में

ज़ैनब पुकारी गरचे हैं फ़ाक़े से बीबियाँ
सदक़ा हमें हराम है फेंको न रोटियाँ
रोती हैं सय्यदानियाँ बाज़ारे शाम में

नेज़े की नोक पर है नसब सर हुसैन का
देखो कलीम मंज़रे शुहदाए कर्बला
चलती हैं ग़म की आँधियाँ बाज़ारे शाम में
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ज़ुल्मो सितम का ये मंज़र, अर्श से मौला देख रहा है
इक नन्हा सा लाशा है, ख़ून में लिपटा देख रहा है

हाय सितम अब्बास तेरी, ये कैसी मजबूरी है
मश्क में आकर तीर लगा,पानी बहता देख रहा है

करबो बला में हैबत है, शेरे ख़ुदा के पोते की
मौला अली के खैबर का, अकबर जलवा देख रहा है

बिन पानी मासूम के लब, तीन दिनों से सूखे हैं
बाप है प्यासे बेटे का फूल सा चेहरा देख रहा है

तशना लबी पे बच्चों की, मौजों में तुग़यानी है
राह हरम के प्यासों की, अब तक दरिया देख रहा है

नहर पे हैं अब्बास पड़े, अकबरो सरवर सोते हैं
ख़ून में डूबी लाशों को, ज़ुल्म का सेहरा देख रहा है

अस्र की अब होती है अज़ाँ, ख़ौफ़ से है बेचैन कलीम
करबो बला के मैदाँ में, मौत का साया देख रहा है
48
जो बोसा गाहे नबी पे ख़ंजर वफ़ा के सजदे में चल रहा है
ज़मीने कर्बल में ज़लज़ला है, सितम पे दरिया उबल रहा है

वो देखो, ज़ालिम ने बेज़ुबाँ के गले पे कैसा है तीर मारा
जो दूध पहले उगल रहा था, वो मुँह से अब ख़ून उगल रहा है

हज़ारों तीरों के ज़ख़्म खा कर गिरा है घोड़े से रन में अकबर
अब आख़िरी साँस चल रही है लहू बदन से निकल रहा है

है दस्त में ज़ुल्फ़ेक़ारे हैदर कफ़न वो बाँधे हुए है सर पर
ये कौन मैदाँ में आ गया है कि रन का मंज़र बदल रहा है

बे आबो दाना भी रह के जिसने बिछा दीं लाशों पे लाश रन में
हुसैन इब्ने अली की दहशत से फ़ौज का दिल दहल रहा है

नवासए मुस्तफा का उसने क़लम तो सर कर दिया है लेकिन
उसे भी है क़त्ल पे नदामत उदू खड़ा हाथ मल रहा है

जो घर में सामाँ था लुट चुका है हरम की नामूस बेरिदा हैं
ज़मीं पे आले नबी का ख़ेमा सितम के शोलों में जल रहा है

ख़ुदा निगहबाँ हुसैन तेरा, असीर जाते हैं कर्बला से
अब आने वाली है रात ग़म की कलीम सूरज भी ढल रहा है
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शिम्र की हैवानियत को ये ज़माना देख ले
कुन्बए इब्ने अली का ग़म उठाना देख ले

तेरे तरकश में हैं कितने तीर ऐ ज़ालिम चला
ज़ख़्म खाकर भी बदन पे मुस्कुराना देख ले

नाम लेती है तेरा, दुनिया हेक़ारत से मगर
है लबों पे आज भी मेरा फ़साना देख ले

सर ख़ुशी से दे दिया, बैयत न की ईमान की
हक़ पे क़ायम है मुहम्मद का घराना देख ले

कर्बला की गर्म तपती रेत पे सजदे में भी
ऐ ख़ुदा इब्ने अली का सर कटाना देख ले

तूने बेदर्दी से मारा तशना लब शब्बीर को
शिम्र अब दोज़ख़ मे है तेरा ठिकाना देख ले

कत्ल सरवर हो गये ग़मगीन कुम्बा है कलीम
जल रहा है शाहे दीं का आशियाना देख ले
50
हाँथ में ले के शमशीर अकबर देखिए रन की जानिब चले हैं
कितनी हसरत से तकती है मादर ,देखिए रन की जानिब चले हैं

शिम्र लोगों से कह दे अब अपने आ रहे हैं वो मैदा में कासिम
है रगों में रवां खूने हैदर देखिये रन की ज़ानिब चले हैं

एक छोटी लहद है कहीं पे,और झूला कहीं पे पड़ा है
रो रही है सकीना दिलावर,देखिये रन की ज़ानिब चले हैं

आख़री वक़्त में जा रहे हैं अपने सर पे लपेटे कफन को
आँख में सबके आँसू है सरवर,देखिये रन की ज़ानिब चले हैं

ले के असग़र को सरवर चले हैं, देखिये दम ब खुद हैं फजाएँ
आज उजड़ते हैं आगोश और घर,देखिये रन की ज़ानिब चले हैं

जा रहे हैं हुसैन अब तो रन में,और रोती हैं सैदानियाँ भी
है बपा खेमए शह में महशर,देखिये रन की ज़ानिब चले हैं

ऐ कलीम अपना सब कुछ लुटा कर आज जाते हैं दुनियां से सरवर
दास्तां ख़ून से दी° की लिख कर,देखिये रन की ज़ानिब चले हैं
51
कर्बोबला में लूट गई दौलत हुसैन की
दुनियां के काम आई शहादत हुसैन की

तपती हुई ज़मीन पे सहरा की धूप में
क्या थे हुसैन देखिये अज़मत हुसैन की

नफ़रत से नाम लेती है दुनियाँ यज़ीद का
ज़िन्दा है सबके दिल में मोहब्बत हुसैन की

बचपन का यूँ किया हुआ वादा निभा दिया
कितनी है बेमिसाल अज़ीमत हुसैन की

सर को नहीं झुकाया भले सर कटा दिया
देखे तो कोई तर्ज़े एबादत हुसैन की

इस दीने मुस्तफा पे वो एहसान कर गए
मक़रूज़ है नबी की ये उम्मत हुसैन की

अपना जवान लाल भी कुर्बान कर दिया
नाना से दिख रही थी यूँ उल्फ़त हुसैन की

नाज़िल हुई वही तो पयम्बर ने रो दिया
हम रो रहे हैं दिल में है चाहत हुसैन की

तन्हा ग़मे हुसैन में हम ही नहीं कलीम
सबको रुला रही है अक़ीदत हुसैन की
52
ऐसे नमाज़े हक़ को अदा कर चुके हैं हम
सजदे में ज़िन्दगी को फना कर चुके हैं हम

नेज़े पे कह रहा है सरे हज़रते हुसैन
अब ज़िन्दगी का कर्ज़ अदा कर चुके हैं हम

ज़ैनब ने रो के ये कहा बाज़ार ए शाम में
इन क़ातिलों के हक़ में दुआ कर चुके हैं हम

हम बवफ़ा हैं ये तो ज़माना है जानता
नाना के दीं से ऐसी वफ़ा कर चुके हैं हम

बातिल की फौज से ये कहा हुर ने साथियो
शह के खिलाफ़ हो के खता कर चुके हैं हम

अब्बास कह रहे हैं सकीना की प्यास पर
दरिया के पास दस्त जुदा कर चुके हैं हम

घर बार सब लुटा के ये शब्बीर ने कहा
ये काम बा रज़ा ए खुदा कर चुके हैं हम

शाने हुसैन कर के कलम बन्द ऐ कलीम
इक काम ज़िन्दगी में भला कर चुके हैं हम
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कायम है इस जहान में जो ग़म हुसैन का
काटा गया था सर न हुआ ख़म हुसैन का

मिट्टी में मिल गये थे इरादे यज़ीद के
“लहरा रहा है आज भी परचम हुसैन का”

तन्हा ही रह गए थे वो मैदाने जंग में
फिर भी यज़ीदी फौज़ में था रम हुसैन का (डर)

मरहम न लग सका कभी ज़ैनब के ज़ख्म पर
दुनियाँ के ज़ख्म पर लगा मरहम हुसैन का

अब्बास बावफ़ा की शहादत को देखकर
जज़्बा ज़रा भी हो न सका कम हुसैन का

गिर कर जमीने कर्बला गुलजार कर गया
बंजर ज़मीं पे क़तरा ए शबनम हुसैन का

कर्बल में यूँ नमाज़ पढी थी हुसैन ने
निकला था खन्जरों के तले दम हुसैन का

कासिम शहीद हो गए अब्बास भी नहीं
बढता ही जा रहा था बहुत ग़म हुसैन का

करबल की याद आज भी दिल में मुक़ीम है
हम तो कलीम करते हैं मातम हुसैन का
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शब्बीर ने कुछ ऐसे इस्लाम बचाया था
सर प्यास की शिद्दत से करबल में कटाया था

ज़ैनब से कोई सीखे पर्दे का तहफ़्फ़ुज़ भी
बाज़ार में चेहरे को ज़ुल्फ़ों से छुपाया था

मासूम के लब सूखे पानी की जगह पर जो
एक तीरे सितम खा कर वो खू में नहाया था

सरवर से कोई पूछे बेबस थे वहां कितने
कांधे पे जवां लाशा अकबर का उठाया था

बीमार के तन पर जब दुर्रे भी लगाए थे
मज़लूम को ज़िंदा में किस तरह सताया था

गालों पे सकीना के मारे थे तमाचे भी
उस फूल सी बच्ची को किस तरह रुलाया था

मज़लूम नहीं था वो इस्लाम का शैदाई
ज़ौहर अली अकबर ने खैबर का दिखाया था

प्यासे ही रहे लेकिन बैयत के रहे मुनकिर
झुकने नही देना सर नाना ने बताया था

आये थे कलीम अपना ईमान बचाने को
इस्लाम के परचम को इस तरह उठाया था

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