नैनों से दर्द का सावन बरसता रहा

नैनों से दर्द का सावन बरसता रहा।
दिल उससे मिलने को तरसता रहा।

उसका दिया हर जख्म हँस के सहा,
देकर दर्द बेपनाह मुझे वो हंसता रहा।

बनकर अजनबी गुजरता वो पास से,
पर प्यार उसका साँसों में बसता रहा।

अपनी नकली मोहब्बत का शिकंजा,
बड़े प्यार से वो मुझ पर कसता रहा।

मैं नादाँ समझ सकी ना उसका इरादा,
झूठी बातों में उसकी दिल फँसता रहा।

जानती हूँ सच पर दिल मेरा मानता नहीं,
रुह की गहराइयों से जो उनसे रिश्ता रहा।

सुलक्षणा के पास जुदाई के दर्द के सिवा,
झूठी मोहब्बत की यादों का गुलदस्ता रहा।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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