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नीम का छाँव लेकर

धूप में हम चल रहे
जेहन में नीम का छाँव लेकर
दूजी भाषा बोलते हैं
अंतस में समूचा गाँव लेकर

गर्म है धरती शहर की
नम नहीं कोमल हृदय है
सूर्य ही बस सूर्य दिखता
हो चुका ओझल निलय है
मानो हम चल रहे
समंदर में कागज नाँव लेकर
धूप में हम चल रहे
जेहन में नीम का छाँव लेकर

मन तो वैसे बाँवरा है
जो मचलता है सदा
यही तो वह जगह है
ख्वाब पलता है जहाँ
ख्वाब के सम्मुख है वक़्त
जो खड़ा है अलाव लेकर
धूप में हम चल रहे
जेहन में नीम का छाँव लेकर

अपना वैसे कम है कोई
खुद का हो जाना है बेहतर
खुद से दूजे को समझना
हो चुका अब है दूभर
हम कहाँ जाए हे प्रभु
दिल का रूठा घाव लेकर
धूप में हम चल रहे
जेहन में नीम का छाँव लेकर
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

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