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नीतिश्लोके

*नीति श्लोके*

भारभूता भवत्युर्वी भ्रष्टाचारेण भूतभिः।
सज्जनानामतिशये अक्लेशमनुभूयति।।

क्षुद्रो राजा शठा मंत्री, स्वार्थलिप्तो प्रजा तथा।
तस्मिन् देशे न उत्थानो, न श्रेयश्च न कीर्तिरपि।

अंकित शर्मा ‘इषुप्रिय’

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