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नाजायज़ रहती अग़र माँ……………

“नाजायज़ रहती अग़र माँ तुम तो,वक्त का अहसास नहीं होता,
दुध का दर्द तो होता पर,कानों को आहाट की ज़रूरत नहीं होती,
माना कि तूम ना दुध का दर्द रख सकती और नाजायज़ भी नहीं रह सकती,
पर माँ तेरा नाजायज़ को तराजू से समन्दर तोलने की ज़रूरत भी नही होती”
-सीरवी प्रकाश पंवार

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