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नशा

मुझे तो अनवरत तलाश है..
उनके लबों पे…
चंचल निश्छल मुस्कानों की,
उनकी निगाहों में…
तैरते अनगिनत…
मधुरमयी अरमानों की,
मुझे तो चंचल ,
अबोध…
कुंचाले भरती हिरणी के…
कोमल पाँवो को…
निहारने का नशा है;
इन्हीं में ढूँढता हूँ …
अपने पीर को,
अपने ईश्वर को,
अपने पैमाने को;
फिर जाने अनजाने…
छोड़ देता हूँ …
उस पगडंडी को….
जो मंदिर,
मस्जिद
व मधुशाला को जाती है।
–कुमार राजीव “अप्पू”

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