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नर्मदा के घाट पर / (नवगीत)

चल रही
पूजा पुरातन
नर्मदा के
घाट पर ।

नर्मदा से
भी अधिक
प्राचीन मंत्रों
का सहारा
ले,पुरोहित
बह रहा है
कर्म की
विपरीत धारा ।
कथा है ये
सत्य की,पर
झूठ के मुँह
पर चढ़ी है,
व्यथा ये
कर्तव्य की
कर्तव्यहीनों
ने पढ़ी है ।

वीर श्रावक
बैठ जाते
हीनता के
टाट पर ।

नीर इसका
क्षीर जैसा
भाव है
अनवरत सेवा,
निर्धनों को
पालती है
दे रही है
धान्य, मेवा ।
इस किनारे
उस किनारे
मंदिरों में
औ’ घरों में,
पिस रहा है
भाव सच का
झूठ के
आडंबरों में ।

बिक रहा है
विष हलाहल
इमरती के
पाट पर ।

बह रही है
मधुर रेवा
चाँदनी से
अधिक शीतल,
भक्त
परकम्मा लगाते
वाहनों से
और पैदल ।
जानते कुछ
भी नहीं हैं
पंडितों के
‘कान लगते’,
धुंध में
आडंबरों की
स्वर्ण जैसे
प्रहर ढहते ।

भेंट चढ़ती
अर्थ-लिप्सा
अंध-श्रद्धा-
हाट पर ।

— ईश्वर दयाल गोस्वामी
छिरारी (रहली),सागर
मध्यप्रदेश ।

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