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नकल

कौवे ने ग़ज़ब ढाया,
खुद पर सफ़ेदी पोती,
ईत्र गुलाल छिड़के ,
हंसगिरी की नक़ल की,
ये तो होता ही !
आज का जमाना उसकी
नक़ल करता है,
जिसका सरेआम
गलफाड़ू विरोध करता है ।
हद हो गई तब,
जब,कागा ,
क्या बोल गया !
हंस को ,
काग बता डाला,
और , ख़ुद को ,
अत्याचार पीड़ित ,
हंस से बनाया गया
काग बता ,
तालियाँ बटोर ली !

डा॰ नरेन्द्र कुमार तिवारी ।

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