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धूप की नदी

तुम्हारे और मेरे
घर के बीच
दोपहर को
आज भी बहती है
पतली-सी
धूप की नदी ।

किन्तु अब
बदल गए हैं,
प्रतिबद्धताओं के सारे समीकरण ।

अब तुम नहीं होती
दरीचे के करीब
नदी के पार
निहारती हुई ।

और मैं
आज भी अपने
दरीचे के पास
बैठा हूँ,
मृगतृष्णा लिए
धूप की नदी के पार
अपलक निहारता हुआ ।

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