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धरती अंवर एक हो गए, प्रेम पगे सावन में

मिली नज़र से नज़र, छवि उतर गई अंतर्मन में
सखियों के संग झूल रही थी, हरे भरे मधुवन में
गोल कपोल नयन रत्नारे,हर ले गई मन चितवन में
गीत प्रेम के घोल सलोनी, प्रीत जगा गई मन में
भिगो रहीं थीं मस्त फुहारें,भीगे भीगे सावन में
प्रेम से भीगे तन मन को, छुपा रही थी आंचल में
मुखमंडल पर बूंदें बर्षा की,दमक रहीं दामिनी में
चमक उठी बिंदी माथे की, पूर्ण चंद्र ज्यों यामिनी में
उड़ते हुए मेघ ठहर गए, छवि निहारत वन में
धरती अंवर एक हो गए, प्रेम पगे सावन में
रोम रोम रोमांचित धरती,झूम रही हरियाली में
पोर पोर चूनर धानी,पगी प्रीत की प्याली में

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