Oct 17, 2016 · 1 min read

दोहे

मेघा संदेशा तुम जा ,अलकापुरी कहना ।
तुमरे बिना कैसे हो, यक्ष का अब जीना ॥

देख ऊपर चढता , वर्षा ऋतु का बादल ।
करता है प्रिया दग्ध , यक्ष का अब सीना ॥

रतनगिरि आश्रम में, आवास है अब मेरा ।
विश्राम प्रमाद वश , मुझे जहर पीना ॥

प्रिया न लगता मन , हाल तेरा जैसा मेरा ।
खोया तुझको है मैंने ,कामदेव से छीना ॥

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