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22 दोहा पहेली

मुझे न कोई पा सके, चीज़ बड़ी मैं ख़ास।
मुझे न कोई खो सके, रहती सबके पास //१. //

छोटी-सी है देह पर, मेरे वस्त्र पचास।
खाने की इक चीज़ हूँ, मैं हूँ सबसे ख़ास // २. //

लम्बा-चौड़ा ज़िक्र क्या, दो आखर का नाम।
दुनिया भर में घूमता, शीश ढ़कूँ यह काम // ३. //

विश्व के किसी छोर में, चाहे हम आबाद।
रख सकते हैं हम उसे, देने के भी बाद // ४. //

वो ऐसी क्या चीज़ है, जिसका है आकार।
चाहे जितना ढ़ेर हो, तनिक न उसका भार // ५. //

देखा होगा आपने, हर जगह डगर-डगर।
हरदम ही वो दौड़ता, कभी न चलता मगर // ६. //

घेरा है अद्भुत हरा, पीले भवन-दुकान।
उनमें यारों पल रहे, सब काले हैवान // ७. //

पानी जम के बर्फ़ है, काँप रहा नाचीज़।
पिघले लेकिन ठण्ड में, अजब-ग़ज़ब क्या चीज़ // ८. //

मैं हूँ खूब हरा-भरा, मुँह मेरा है लाल।
नकल करूँ मैं आपकी, मिले ताल से ताल // ९. //

सोने की वह चीज़ है, आती सबके काम।
महंगाई कितनी बढ़े, उसके बढ़े न दाम // १०. //

नाटी-सी वह बालिका, वस्त्र हरे, कुछ लाल ।
खा जाए कोई उसे, तो फिर मचे बवाल // ११. //

अंग-रूप है काँच-का, रंग सभी अनमोल।
आऊँ काम श्रृंगार के, काया मेरी गोल // १२. //

अद्भुत हूँ इक जीव मैं, कोई पूंछ, न बाल।
बैठा करवट ऊँट की, मृग सी भरूँ उछाल // १३. //

बिन खाये सोये पिए, रहता सबके द्वार।
ड्यूटी देता रात-दिन, छुट्टी ना इतवार // १४. //

तनकर बैठा नाक पे, खींचे सबके कान।
उसका वजूद काँच का, देना इसपर ध्यान // १५ //

सर भी उसका पूंछ भी, मगर न उसके पाँव।
फिर भी दिखे नगर-डगर, गली-मुहल्ला-गाँव // १६ //

आ धमके वो पास में, लेकर ख़्वाब अनेक।
दुनिया भर में मित्रवर, शत्रू न उसका एक // १७ //

पूंछ कटे तो जानकी, शीश कटे तो यार।
बीच कटे तो खोपड़ी, नई पज़ल तैयार // १८ //

तेज़ धूप-बारिश खिले, देख छाँव मुरझाय।
अजब-ग़ज़ब वो फूल है, काम सभी के आय // १९ //

गोरा-चिट्टा श्वेत तन, हरी-भरी है पूँछ।
समझ न आये आपके, तो कटवा लो मूँछ // २० //

दरिया है पानी नहीं, नहीं पेड़ पर पात।
दुनिया है धरती नहीं, बड़ी अनोखी बात // २१ //

अन्धा हूँ पर हैं नयन, मुख रहते मैं मौन।
पैर होते न चल सकूँ, यार बता मैं कौन // २२ //

***

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