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Nov 23, 2016 · 1 min read

दोधक छंद

211 211 211 22

साजन-साजन रोज पुकारूँ
आँगन-आँगन द्वार निहारूँ।
पीर नहीं सजना अब जाने
भूल गये अब क्या पहचाने।।

1 Comment · 541 Views
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