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दे ताली —गीत—डी. के. निवातिया

दे ताली ……………

वो क्या जाने मोल दाल भात का,
जिनके घर रोज़ बनती मेवे की तरकारी
नाश्ता होता जूस और फल से
खाने में बनती हो हर रोज़ बिरयानी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

जिसने ने जानी किसान की मेहनत
कैसे चलती है गरीबो की जिंदगानी
वो क्या जाने सुगंध मिटटी का,
जिसने खुले आकाश में न जींद गुजारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!

क्या लेना दुनियादारी से
जिनके आगे पीछे लगी चमचो को लारी
नेताजी का ताज पहनकर
शान से निकलती है उनकी तो सवारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

जिनको जनता ने समझा काबिल
बैठकर संसद में वो बकते है गन्दी गाली
उस घर की हिफाज़त हो कैसे
जब रक्षक ही बन बैठे गुंडे और मवाली !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

वो क्या जाने दर्द किसी का
पीढ़ी दर पीढ़ी जिसने ऐश में गुजारी
मरे किसी का लाल भले ही,
उन तक तो पंछी ने कभी पर न मारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

एक साथ बैठकर दावत उड़ाते
मज़े से मनाते रोज़ ईद और दिवाली
झूठ की थाली के है वो चट्टे बट्टे
दूजे को चोर बताकर, खूब बटोरेते है ताली !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

वो क्या जाने दुःख टूटी मड़ैया के,
महलो में हो जिसने अपनी राते गुजारी,
मखमल और फूलो में बीते जिंदगी
चिता में भी लगती घी चन्दन की चिंगारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

कोई श्वेत कोई भगवा धारण कर
समाज में फैलाते नफरत की चिंगारी
फिर घर में बैठ वो देखे तमाशा
जब आपस में लड़ती है ये जनता बेचारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

बात न पूछो संत फकीरो की,
जो बन बैठे है आज मुखोटा धारी
झूठ मूठ के फैलाये तंत्र मन्त्र
डरकर सेवा में तत्पर रहते कोटि नर और नारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

कोई भूखा तरसता दो टूक को
कही पकवानो से होती है रोज़ा इफ्तारी
कही सड़को पे घूमे बच्चे नंगे
किसी की पोशाकों से भरी अलमारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

देश की रक्षा लगी दांव पर
आतंक को भेंट चढ़ते बच्चे, बूढ़े नर – नारी
घर का भेदी जब लंका ढहाये
फिर औरो को हम क्यों बकते है गाली !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

नारी सम्मान पर देते जो भाषण
कहलाने को जग में सबसे बड़े संस्कारी
पीड़ित होती उनके हाथो अबला,
अस्मित लूटते निशदिन बनकर व्यभिचारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्..!!

वाह रे दाता, वाह रे मौला,
बहुत देखी दुनिया में तेरी कलाकारी
किसी को फूलो का ताज बख्शा
किसी की सारी उम्र फुटपाथ पे गुजारी !!

दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!
दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …..!!
दे ताली ……दे ताली…… दे ताली ..भई… दे ताली …्््..!!

!

[__@__[[ डी. के. निवातिया ]]__@__]
******************************************

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