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माँ

*दोहे*

*माँ*
बिना बीज होती नहीं, कभी फसल तैयार।
माँ क़ुदरत का नूर है, धरती पर अवतार।।
2
हर पल चिंता वो करे, सांसें करे उधार।
कागज, कलम दवात से, माँ है मीलों पार।।
3
हर दिन साँसों में चढ़े, जिसका क़र्ज़ अपार।
खिली खिली वह धूप है, ममता की बौछार।।

सूर्यकांत द्विवेदी

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