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Oct 1, 2017 · 1 min read

दिखते हैं खामोश मगर हम अंदर अंदर बिखरे हैं

दिखते हैं खामोश मगर हम अंदर अंदर बिखरे हैं
इस दिल में तो जगह जगह केवल डर ही डर बिखरे हैं

आंखों में देखिये हमारे कितने सागर बिखरे हैं
यादों के सीपों से जबसे मोती छिटकर बिखरे हैं

साथ समय के चलते चलते चाहें दूर निकल आये
मगर निगाहों में तो वही पुराने मंज़र बिखरे हैं

युवा आज के त्याग प्रेम की परिभाषा ही भूल गये
तभी अना के कारण देखो कितनों के घर बिखरे हैं

बूढ़ा शजर अकेला तूफानों में नहीं सँभल पाया
टूट गयीं शाखाएं ,पत्ते भी इधर उधर बिखरे हैं

फूल मिले गर राहों में तो तुम ये भूल नहीं जाना
इन राहों पर जगह जगह ही कंकड़ पत्थर बिखरे हैं

छीन रहा है वक़्त ‘अर्चना’ अपनों को धीरे धीरे
ऊपर से चट्टान मगर हम भीतर भीतर बिखरे हैं

डॉ अर्चना गुप्ता

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