Sahityapedia
Login Create Account
Home
Search
Dashboard
Notifications
Settings
16 Jul 2016 · 1 min read

दाना पानी के सिलसिले

दाना-पानी के सिलसिले परदेश में ले जाते
बच्चे माँ-बाप से बिछड़, अपनी जीविका कमाते।
बूढ़ो की अपनी मजबूरी नीरस जीवन जीते
एक समय लाचार हो, शरण वृद्धाश्रम पाते।

Language: Hindi
Tag: मुक्तक
1 Comment · 304 Views
You may also like:
छठ पर्व
सत्यम प्रकाश 'ऋतुपर्ण'
भूख
Saraswati Bajpai
गुजर रही है जिंदगी अब ऐसे मुकाम से
Ram Krishan Rastogi
प्रेम कविता
Rashmi Sanjay
💐💐सुषुप्तयां 'मैं' इत्यस्य भासः न भवति💐💐
शिवाभिषेक: 'आनन्द'(अभिषेक पाराशर)
सच्चाई का मार्ग
AMRESH KUMAR VERMA
गुरु-पूर्णिमा पर...!!
Kanchan Khanna
अदम गोंडवी
Shekhar Chandra Mitra
इसीलिए मेरे दुश्मन बहुत है
gurudeenverma198
“सराय का मुसाफिर”
DESH RAJ
अक्स।
Taj Mohammad
तरुवर की शाखाएंँ
Buddha Prakash
सियासत की बातें
Dr. Sunita Singh
हमसे न अब करो
Dr fauzia Naseem shad
एक आवाज़ पर्यावरण की
Shriyansh Gupta
✍️जिद्द..!✍️
'अशांत' शेखर
नशे में फिजा इस कदर हो गई।
लक्ष्मी सिंह
ग़ज़ल
डॉ सगीर अहमद सिद्दीकी Dr SAGHEER AHMAD
मृत्यु या साजिश...?
मनोज कर्ण
रावण का तुम अंश मिटा दो,
कृष्णकांत गुर्जर
” विषय ..और ..कल्पना “
DrLakshman Jha Parimal
आइए डिजिटल उपवास की ओर बढ़ते हैं!
Deepak Kohli
मेरे पापा...
मनमोहन लाल गुप्ता 'अंजुम'
सारे आँगन पट गए (गीतिका )
Ravi Prakash
याद रखना मेरी यह बात।
Anamika Singh
"याद आओगे"
Ajit Kumar "Karn"
"तुम हक़ीक़त हो ख़्वाब हो या लिखी हुई कोई ख़ुबसूरत...
Lohit Tamta
आस्था
Shyam Sundar Subramanian
- साहित्य मेरी जान -
bharat gehlot
राहे -वफा
shabina. Naaz
Loading...