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तू यहां क्यों आया भोले मुसाफिर !!….( अमर अदाकार स्व सुशांत सिंह राजपूत की स्मृति में)

तू यहां क्यों आया मुसाफिर ,यह तेरी मंजिल नहीं थी ,
मौत खड़ी थी तेरे लिए यहां तेरी जिंदगी यहां नहीं थी ।

तू कमल का फूल गंदी नाली में कैसे आया ” पगले”!
तू तो न आता मगर तेरे दुर्भाग्य ने ये चाल चली थी ।

रूप गुण और अदाकारी में तू बेमिसाल था बेशक ,
मगर तेरा मोल जानने को जोहरी की नजर नहीं थी ।

यह गंदा नाला है हर प्रकार की गंदगी ही यहां बसती ,
षड्यंत्र , कूटनीति , कुचेष्टा ही यहां बस मिलनी थी ।

यह वो जगह है जहां जीतेजी इंसान नर्क भुगतता है ,
दौलत और यश पाकर भी मन को शांति नहीं मिलती ।

तेरे जैसा भला मानस ,सज्जन और संस्कारी युवक ,
ना जाने कैसे सह गया सितम,यहां इंसानियत नही थी ।

चूंकि भारतीय संस्कृति सभ्यता से जुदा है यह दुनिया ,
यहां मान मर्यादा ,शराफत जैसी कोई चीज नहीं थी ।

माया नगरी ही थी यह जिसे देख कर तू भटक गया,
तुझसे भूल हुई भारी ये तेरे ख़्वाबों की ताबीर नही थी ।

तू सुशिक्षित,हुनरमंद था कही और भाग्य आजमाता,
यहां आकर तो तूने अपनी कद्र और जिंदगी खोनी थी।

किसी घर का चिराग था तू बेदर्दी से बुझा दिया गया,
तेरे कातिल आजाद हैंजिनको सजा मिलनी चाहिएथी

तुझे खो दिया तेरे अपनों ने किसी का गया भी क्या?
वक्त से पहले तेरा साथ छूट गया ,यह अनहोनी थी ।

तेरे कातिल समझ रहे है की उन्होंने तुझे बुझा दिया
, मगर तू सूरज है तेरी रोशनी कभी कम होनी नहीं थी ।

राज करेगा कयामत तक अपने कद्रदानों के दिलों में,
चूंकि वो श्रेष्ठ अदाकारी के साथ सद्गुणों की मिसाल थी ।

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