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तुम निष्ठुर भूल गये हम को, अब कौन विधा यह घात सहें।।

नमन माँ शारदे
#विधा:- दुर्मिल सवैया छंद आधारित गीत
विधान:- सगण आठ आवृत्ति
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पदचाप सुने बहु वर्ष गए, निज नैनन से जलधार बहे।
तुम निष्ठुर भूल गये हम को, अब कौन विधा यह घात सहें।

जिस यौवन में अनुराग नहीं, उस यौवन का कुछ मोल नहीं।
अनुरक्ति बिना मनमीत सुनों, इस जीवन का कुछ मोल नहीं।
बिन साजन सावन सावन क्या, उस सावन का कुछ मोल नहीं।
मनभावन त्याग दिये पथ में, अनुधावन का कुछ मोल नहीं।।
दुख और बढ़े जब लोग कहें, सुख सङ्ग सदा अहिवात रहे।
तुम निष्ठुर भूल गये हम को, अब कौन विधा यह घात सहें।।

सखियाँ नित पुष्प चुगाँ करती, मम कण्टक भाग्य सदा पड़ता।
निज भाग्य रहा जब सुप्त पड़ा, किस भाँति महिधर पे चढ़ता।
तुम तोड़ गये सपने सब ही, जिस कारण शोक रहा बढ़ता।
सुख सौतन में यदि ठूँठ लिया, मन स्वप्न नवीन कहाँ गढ़ता।
उर आँगन आज निराश पड़ा, कित आस लगा हम पंथ गहें।
तुम निष्ठुर भूल गये हम को, अब कौन विधा यह घात सहें।।

सजना सपना गहना सपना, दुख से पूरित यह जीवन है।
अब प्रेम बिना निज आलय तो, हमको लगता बस कानन है।
दिन-रात सहूँ यह पीर भला, किस कारण भार भरा मन है।
बिन नेह मलीन दिखे मुख भी, अब कान्ति विहीन हुआ तन है।
सपनें सब खण्डित हर्ष गया, किस से उर की सुन बात कहें।
तुम निष्ठुर भूल गये हम को, अब कौन विधा यह घात सहें।।

✍️ संजीव शुक्ल ‘सचिन’

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