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तुम्हारी बात

तुम्हारी बात को……
नजरअंदाज हम न कर पाए
इसके चक्कर में न हम जी पाए न मर पाए
अब तो जेहन का हर कतरा मुझे कोसता है
बताओ भला इसे छोड़कर हम किधर जाएँ

तुम्हारी बात को…..
हमेशा भूलने की कोशिश की है
वैसे वक्त ने बहुत बड़ी रंजिश की है
भूलने के अंतिम पायदान पर हूँ खड़ा
मेरे दिल ने मेरे दिमाग़ पर दबिश दी है

तुम्हारी बात को…….
रख दिया है दिमाग़ के किसी कोने में
सच कहूँ तो मजा आया है इसे खोने में
बात महज बात थी ये इल्म देर से हुआ
इसके बीच खेल गए तुम दिल जैसे खिलौने से
-सिद्धार्थ गोरखपुरी

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