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26 May 2022 · 1 min read

तपों की बारिश (समसामयिक नवगीत)

नीर बरसा,
तपतपाते
जेठ में भी ।

रोहिणी में
शीतला के,
मेघ बरसे
घरघराते ।
कुरितु आई
बूँद लेकर,
तड़ित चमकी
कड़कड़ाते ।
अँध उड़ती,
हवा चलती,
पेड़ उखड़े,
तार टूटे ।
गिरा मंडप,
बुझी आगी,
भरी भाँवर
वधू रूठे ।

उमस छाई
दुकानों में,
सेठ में भी ।

धूप के सँग
गिरा पानी,
बंदरों का
ब्याह होता ।
चिड़ा-चिड़िया
घोंसले में,
पपीहे का
कंठ रोता ।
प्यास बुझती
मवेशी की,
भरा पानी
कूप में कुछ ।
लू ठिठकती,
गिरा पारा,
कमी आई
धूप में कुछ ।

आर्द्रता है
मूछ में भी,
ऐंठ में भी ।

नीर बरसा,
तपतपाते
जेठ में भी ।

000
—– ईश्वर दयाल गोस्वामी ।

Language: Hindi
Tag: गीत
9 Likes · 11 Comments · 177 Views
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