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डर

अपनी परछाई से ही बातें करते हैं,
अपनों से ही कुछ कहते डरते हैं,
कहाँ मुमकिन है सबके लिए
अच्छा बन जाना
किसी न किसी को तो चुभते ही रहते हैं,
डर लगता है बात करते औरों से,
अपनी परछाई से ही बातें करते हैं,
निराशाओं के भवँर गहरे पड़ते हैं मन में,
वहाँ दबी कुंठाऐ भी सिर उठाती हैं,
आक्रोश जब बढ़ जाता है
तो कहाँ सँभल पाते हैं
तब डर लगता है बात करते औरों से,
अपनी परछाई से ही बातें करते हैं ,
कौन अपना है इस जगत में
व्यर्थ मन ने भ्रम पाले हैं,
झूठे रिश्ते सब स्वार्थ का दम्भ संभाले हैं,
जब घुटन बढ़ती है ज़हन की
तो कहाँ निकाल पाते हैं,
तब डर लगता है बात करते औरों से,
अपनी परछाई से ही बातें करते हैं,
जब अपने देते अनंत पीड़ा,
अनजाने से बन इल्ज़ाम लगाते हैं,
कहाँ उस सन्नाटे से उभर पाते हैं
जो घिरने लगता है अंतर्मन की गहराइयों तक,
अंतहीन कंथाओं का विवरण कहाँ निथार पाते हैं
तब डर लगता है बात करते हैं औरों से
अपनी परछाई से ही बातें करते हैं,
स्वंय का स्वंय से ही नाता ही सुखद रहा
जो कैसे भी ख़ुद को संभाले हैं
वरना रिश्ते और भावनाएं तो भरम के मकड़जाले हैं,
दुःख और पीड़ा ही सर्वश्रेष्ठ है
जो सच्चाई का यथार्थ संभाले हैं ,
सच में डर लगता है बात करते हैं औरों से
अपनी परछाई से ही बातें करते हैं

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