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May 16, 2022 · 1 min read

ठंडे पड़ चुके ये रिश्ते।

रिश्तों को तोड़ते ये आजकल के रिश्ते,
गर्माहट से मीलों दूर ठंडे पड़ चुके ये रिश्ते।
कभी तूफानों में ढ़ाल सदृश हुआ करते थे जो रिश्ते,
आज एक स्पर्श से धाराशायी होते हैं वही रिश्ते।
कभी सुकून की छांव देते थे जो रिश्ते,
अब हाथों में खंजर लिए फिरते हैं वही रिश्ते।
घर को कहकहों की तस्वीर बनाते थे जो रिश्ते,
आज उस घर को सन्नाटों में धकेलते वही रिश्ते।
बारिश में कागज की कश्तियों से खेलते थे जो रिश्ते,
ना जाने इस बारिश में कहाँ बह गये वही रिश्ते।
इक थाल से कभी स्वाद चखते थे जो रिश्ते,
तन्हा थालों से जीवन को बेस्वाद करते वही रिश्ते।
होली के रंगों से सराबोर हुआ करते थे जो रिश्ते,
आज सफेद चादरों में सिमट कर रह गए वही रिश्ते।
कभी घर के कोनों में लुकाछिपी खेला करते थे जो रिश्ते,
जीवन के इस खेल में जाने कहाँ छिप गए वही रिश्ते।
कभी आंखों से आंसूओं को पोछते थे जो रिश्ते,
अब तो बस आंसुओं की वजह बनते हैं वही रिश्ते।
बचपन में हाथों में हाथ थामें चला करते थे जो रिश्ते,
आज हाथ छुड़ा जाने कहाँ निकल गए वही रिश्ते।

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