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जो छुपी थी बात उसका अब असर होने को है(तरही गजल)

जो छुपी थी बात उसका अब असर होने को है
आज उसका ही तो चर्चा दर ब दर होने को है।

देख लेंगे जो भी होगा हाल इसके बाद में
जिंदगी का जाम देखो मय से तर होने को है।

आसरा देता रहा जो सबको अपनी छाँव में
लग रहा अब दूर उससे उसका घर होने को है।

बात हमसे वो नहीं करते सही से आज कल
*ऐसा लगता है कि किस्सा मुख्तसर होने को है।*

हौंसलों औ मिहनतों से अब अमल होता रहे
वर्ना मुश्किल जिंदगी की हर डगर होने को है।

बाँटने से बढ़ ये जाती ऐसी दौलत है सही
जोड़ कर रख ली मुहब्बत बे असर होने को है

फैसला उनको सुनाना हम पे भारी यूँ पड़ा
अब खिलाफत उनकी हमसे उम्र भर होने को है।

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