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जुद़ा किनारे हो गये

वेपर्द़ा नशी गलियों के पर्द़ा हो गये ,
मतलब की गरज़ से हमारे हो गये ।
जग यार बने यारी की दम दे गये ,
वक्त पर नदी के किनारे हो गये ।
लुभाया चाँद-सितारों का सपना दिखा,
मक़ाम आया तो जुदा किनारे हो गये ।
कारवां बढ़ता रहा हाथों को थामके ,
कितने दूर पलक़ के तारे हो गये ।
फस़ले ब़हार क्यूँ रूठी है चमन से ,
मुंह के निव़ाले अब नियारे हो गये ।
————————————————-
शेख जाफर खान

8 Likes · 4 Comments · 270 Views
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