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जीवन एक कारखाना है /

जीवन एक
कारख़ाना है,
हम सब हैं
इसके मज़दूर ।
छोटे, बड़े
और मझले ।
गंदे, स्वच्छ
और धुँधले ।
अच्छे, बुरे,
बहुत अच्छे ।
झूठे और
बहुत सच्चे ।
कुशल, अकुशल
व शिक्षित ।
अशिक्षित
व प्रशिक्षित ।
बंद नहीं होता
कारख़ाना और
न होती है हड़ताल ।
कोई अधिकारी
न करता, इसकी
कभी जाँच-पड़ताल ।
जैसे नीर
प्रवाहित होता
वर्षा और
यहाँ नदियों से ।
वैसे ही होता
उत्पादन इसमें
सतत् और
सदियों से ।
बनता रहता माल
निरंतर अच्छा,
बुरा और कच्चा ।
कभी ठोस
बिल्कुल पक्का ।
जीवन की शैलीं
हैं जितनी ।
वही मशीनें
हैं इसकीं ।
इनमें हम अनवरत
डालते हैं ईंधन ;
भाँति-भाँति का
रंग – रंग का ।
कभी मित्र का
या चरित्र का ;
नैतिकता का
मानवता का ;
अच्छाई का
सच्चाई का ;
कभी असत्य का
और फ़रेब का ;
रोकड़ों से
भरी ज़ेब का ।
राजनीति का
और अनीति का ;
ज्ञान का, विज्ञान का,
भजन और ध्यान का ;
जप-तप
और वफ़ादारी का ;
दुनियाँ भर की
मक़्क़ारी का ।
मनमर्ज़ी का ,
ख़ुदग़र्ज़ी का ।
प्यार का, स्नेह का,
करूणामयी देह का ;
आफ़ताब का,
माह़ताब़ का ।
हर्ष का, विषाद का ,
दंग़ा और फ़साद का ;
खिलने बाली आज़ादी का,
बढ़ने बाली आब़ादी का ।
बहुत मशीनें
बहुत है ईंधन,
मज़दूरों की कमी नहीं है ।
ईर्ष्या भी है,
द्वेष सभी में
पर,आँखों में नमी नहीं है ।
इसमें कुशल श्रमिक
हैं जो भी, वो करते
तैयार माल जो,
उससे निकले
कवि और लेखक,
विज्ञानी,ध्यानी, सन्यासी ।
अकुशल श्रमिक भी
मेह़नत करते,और
बनाते अपना माल ।
आपत्ति में बनें सहारा,
समय बनाते हैं ख़ुशहाल ।
इनसे बनते
रिश़्ते-नाते, भाईचारे ।
इनकी सँख्या
सबसे ज़्यादा लेकिन
ये अब तक ” बेचारे ” ।
शिक्षित श्रमिक
बहुत ही कम हैं,
पर, पूरा ही
इनमें द़म है ।
सदा चलाते अपनी सत्ता ।
लेकर महँग़ा-महँग़ा भत्ता ।
इनसे बनते हैं अधिकारी ।
उद्योगपति एवं व्यापारी ।
रोज़ लूटते ये दुनियाँ को,
पर, दुनियाँ इन पर बलिहारी ।
कुछ मज़दूर
प्रशिक्षित भी हैं,
जो इन सबसे भी ऊपर हैं ।
इनको कुछ
न करना पड़ता ।
लेकिन इनसे
ही सब चलता ।
ये जिस पर भी हाथ फेरते,
समझो !
उसका भाग्य बदलते ।
‘शिक्षित’ जो भी
लूट कराते, वह
इनके ख़ाते में जाती ।
जनता कहती
इनको ईश्वर, सदा
ख़ुशामद इनको भाती ।
कुछ मज़दूर
अशिक्षित भी हैं,
ये ख़ुद कुछ न
कर पाते हैं, परजीवी हैं ।
भाषा इनकी
शब्द और के ।
उड़ते ये हैं,
पंख और के ।
इसीलिए ये गिर जाते हैं ।
चक्कर में ये घिर जाते हैं ।
कट जाते हैं,
मर जाते हैं ।
लोग समझते
तर जाते हैं ।
कुछ बद़माश़
श्रमिक हैं ऐंसे
इनमें प्रतिभा अपरंपार ।
इनको हम ही
चुन लेते हैं ।
यही चलाते हैं सरकार ।
जीवन अज़ब
कारख़ाना है ।
तुमने माना, हमने माना,
सबने ही इसको माना है ।
होता जो भी,
वह होना था ।
खोता जो भी,
वह खोना था ।
जो सोता,
उसको सोना था ।
जो रोता,
उसको रोना था ।
पीना कैसा ?
सब पीते हैं ।
जीना कैसा ?
सब जीते हैं ।
करना क्या है ?
सब करते हैं ।
मरना क्या है ?
सब मरते हैं ।
सदा रहा, न सदा रहेगा,
यहाँ किसी का
अविचल डेरा ।
चले, चलो तुम,
बढ़े, चलो तुम ;
ये दुनियाँ है रैन-बसेरा ।

– ईश्वर दयाल गोस्वामी ।

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