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1 Jun 2023 · 2 min read

जीने का सलीका

ये तेरी पावन मातृभूमि, नही है भूमि मात्र ।
सूत्रधार तू हर गाथा का नही है मात्र पात्र ।।

कर इसको सादर नमन् भूमि है ये महान ।
यही है तेरी मंजिलें, यही खुशी का जहान ।।

फिर निकल गंतव्य को कर पुनः प्रस्थान ।
करदे जीवन और जग-जीवन का उत्थान ।।

तेरा परिश्रम ही है तेरी सफलता का मूल ।
जो खिला सकता है पत्थरों में भी फूल ।।

जो सतत सींचती संवारती संतति सन्तान
ये नारी,नदी,धरती, प्रकृति चाहती सम्मान ।।

“जियो और, जीने दो” का तेरा यह विचार ।
स्वर्ग से भी सुंदर बना सकता है ये संसार ।।

तेरी धड़कनों में प्रेम की धुन है जो गूंजी ।
यही तो तेरा प्रेम ही है सबसे बड़ी पूंजी ।।

कभी अपनी धड़कनों को भी तो सुना कर ।
प्रेमधागों से भी कभी सपनों को बुना कर ।।

कभी बचपन की माॅ की, लोरी भी गुनगुना ।
अभी बूढ़ी मॉ की पुकार मत कर अनसुना ।।

कभी बच्चों से भी तो तू बोल तुतला कर ।
बूढ़े-बिसरों से भी मिल बिना इत्तला कर ।।

हिसाब ; चार दिन की जिन्दगी पाने का ।
एक दिन सोने का तो, एक दिन खोने का ।।

बचे दो दिन ; एक दिन कर ले कुछ काम ।
बाकी कर दें ये एक दिन, दूसरों के नाम ।।

रंज में डूबे को भी डूबा दे कभी रंग में ।
पीछे छूटे को भी ले चल कभी संग में ।।

जिंदादिली संग जीने से जिंदगी बढ़ती है ।
लघु प्रेमगीत भी लंबे आलाप से पढ़ती है ।।

जब हम कहते हैं मृत्यु तो अटल सत्य है ।
तो जीवन भी तो शाश्वत साक्षात् तथ्य है ।।

ये जिंदगी, ये दुनिया एक बार ही मिलती ।
खुश रहने से ही तो फूलों सी ही खिलती ।।

जीवन है अनमोल ले इसे जान-पहचान ।
चाहे बना लें हैवान या चाहे बना दें महान ।।
~०~
मौलिक एवं स्वरचित : रचना संख्या-११
जीवनसवारो, मई २०२३.

Language: Hindi
111 Views
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