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Mar 30, 2022 · 1 min read

जाने कैसी कैद

जाने कैसी कैद में हूं ?
कुसमय की पैठ में हूं ।
ज़द में मेरी अब नहीं कुछ
फासलों की बैठ में हूं ।
जो वायु प्राणदायिनी
मुझको छू न पा रही ।
तन की सारी चेतना
धूप काल की सुखा रही ।
मैं जी रही ज़रा ज़रा
मैं घुल रही ज़रा ज़रा
न पूरा जी ही पा रही
न पूरी घुल ही पा रही ।
ऊब जो जीवन की है
वो गले तक भर गई ।
न सांस ढंग से आ रही
न सांस ढंग से जा रही।

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