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Jun 9, 2016 · 1 min read

जाग्रति

?
जागृति

××××××××××××××××××××××××××××
डर दफ़न कर दे कहीं पर
ख़ौफ़ को कर दे विदा ।
अब नहीं रहना तुझे भी
जिंदगी से गुमसुदा ।।

अब तो है प्रत्यक्ष मंजिल
रास्ते भी धूल चुके ।
अब नहीं बादल गगन में
अब है मकसद मिल चुके ।।

तुम लिए हो प्रण कि तुम
जग को जगाकर जाएगा ।
तुम ही हो जो इस गगन में
सूर्य बनकर आएगा ।।

सब है तेरे हाथ में
सत्य भी है साथ में ।
न्याय निर्धारित हुआ
वृक्ष के हर शाख में ।।

हो रही मेहनत मुकम्मल
सत्य युग फिर आ रहा है ।
एक दीपक से हजारों
दीप सब सुलगा रहा है ।।

सज्जनें अधिकाँश हैं और
दुर्जनें दो पांच ही हैं ।
इन सभी सच्चाइयों को
हम सभी दिखला रहे हैं ।।

जान जाना न्याय को ही
अन्याय का विध्वंस है ।
है जने अनभिज्ञ जिससे
आज इतने कंस हैं ।।

एक से अब कुछ नहीं
होगा यहां ये जानकर ।
न्यायप्रेमी सत्यजन भी
भीड़ बनकर आ रहे हैं ।।


सामरिक अरुण
NDS झारखण्ड
14/04/2016

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