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Sep 9, 2017 · 1 min read

जागो

जागो
जंगलात को काट काट हम बना रहे हैं शहर,
प्रकृति का प्रकोप कभी बन कर गिरेगा कहर।
कुदरत और प्राणी दोनों हैं इक दूजे के पूरक,
न समझा मानव अभी तो आगे पछताएगा मूरख।।

——–रंजना माथुर दिनांक 09/07/2017
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

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