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Sep 10, 2017 · 1 min read

ज़िन्दगी को छोड़कर जाता रहा…

ज़िन्दगी को छोड़कर जाता रहा…
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रोज़ ही बाज़ार वो जाता रहा।
रोज़ खाली हाथ क्यूं आता रहा।।
ज़िन्दगी भर मुफलिसी का साथ था,
भूख से हर रोज़ ही नाता रहा।।
हाथ में लेकर गया कासा कभी,
भीख में भी लानतें पाता रहा।।
लोग सब दुत्कारते रहते उसे,
गालियां ही रोज़ वो खाता रहा।।
दर्द दामन में छुपाकर रोज़ ही,
दर -ब- दर की ठोकरें खाता रहा।।
दोस्त कोई था न कोई दिलरुबा,
गर्दिशों के गीत ही गाता रहा।।
हाय! था लाचार वो कितना यहां,
ज़िन्दगी को छोड़ कर जाता रहा।।
©कुमार ठाकुर
09 सितंबर 2017

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