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*ज़बान*

ज़बान का जो खरा नहीं है!
यकीन उसपे ज़रा नहीं है!!
::::::::::::::::::::
लगे असंभव उसे हराना!
वो आंधियों से डरा नहीं है!!
::::::::::::::::::::
समझ सके ना किसी की’ पीड़ा!
के’ ज़ख्म जिनका हरा नहीं है!!
::::::::::::::::::::
लहू हमारा लो’ पी रहा वो!
गुनाह से दिल भरा नहीं है!!
::::::::::::::::::::
रहे मुसाफ़िर सदा शिखर पे!
ज़मीर जिसका मरा नहीं है!!
::::::::::::::::::::
धर्मेन्द्र अरोड़ा “मुसाफ़िर”
(9034376051)

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