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जरूरी नही था

ज़रूरी नहीं था की दुनिया के रंग देखूँ,
ज़िगर का टुकड़ा बनाना भी ज़रूरी नहीं था,
बस ज़रूरी था की तेरे गर्भ में पल भर रहूँ,
वैसे तो बेटी कहना भी तो ज़रूरी नहीं था,

सही कहाँ है किसी ने की किस्मत खुदा के हाथ में,
मेरा खुदा भी तू और जीना भी तेरे हाथ में,
शायद मेने जहाँ के रंग कुछ पहले छेड़ दिए होंगे,
कि रंग देखने के पहले तूने ज़मी में दफ़ना दिया।

शायद खुदा होने नाते माँ तूने मेरा भविष्य देखा होंगा,
कभी लकीरों की आड़ में तो कभी दुष्कर्म की आड़ में जला होंगा,
मान लुंगी माँ लकीरों के आगे तेरी भी मज़बूरी रही होंगी,
फिर भी माँ लकीरों की आड़ में तो भरोसा जलाया होंगा।

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