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Aug 16, 2016 · 1 min read

जब उजाला गली से गुज़रने लगा

जब उजाला गली से गुज़रने लगा
सब अंधेरों का चेहरा उतरने लगा

दौर बदला तो मैं भी बदल सा गया
बे’गुनाही से अपनी मुकरने लगा

शाम आयी तो तेरा ख्याल आ गया
आईना मेरे घर का संवरने लगा

खुशबुओं की तरह इत्र दानों में थे
जब हवा चल गयी सब बिखरने लगा

एक ग़ज़ल कह सकूं गर इजाज़त मिले
अांसुओं का ये झरना निखरने लगा

– नासिर राव

1 Like · 1 Comment · 159 Views
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