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Mar 16, 2022 · 1 min read

जग का राजा सूर्य

उठो सुंदर जग के प्यारे,
भोर का राजा ताज सजाए नजर आए,
आसमान से देख-देख मुस्कुराए ।

लालिमा लिए चमकती आभा देख,
किरणों से रंग-बिरंगे संसार को सजाए,
धीरे-धीरे जग को जगाए ।

देख प्रकाश को बहती जाए ,
नदिया झरने सरोवर की लहरें गीत गुनगुनाए ,
सुरमई संगीत धरा को भाए ।

पेड़-पौधे पवन संग मिल ,
ठंडी समीर पुष्पों के बीच गुजरती आए,
सुगंधित कर वातावरण को महकाए ।

ऊंँचे पर्वत स्थिर है जग में ,
खड़े हुए सब राज दरबार है सजाएं,
स्वागत में जैसे आंँखें हैं बिछाए ।

आकर के सूर्य दोपहर के मध्य,
आसन ग्रहण कर नभ में ऊपर बैठे ,
संसार के हर कोने झांँके ।

धूप पसीना खूब बहा कर ,
पशु-पक्षी संसार जनों से मिलकर दिन-भर ,
सांँझ होते लौटते घर को ।

डूब जाते निद्रा में जब ,
अंधकार मौका पाकर आए लगा डराने ,
अगली सुबह आकर अंधकार भगाते ।

रचनाकार –
बुद्ध प्रकाश,
मौदहा हमीरपुर ।

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