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25 Dec 2022 · 2 min read

💐💐जगत में कौन आत्ममुग्ध नहीं है💐💐

##मणिकर्णिका##
##आत्ममुग्ध हूँ,चल माना##
##मैं क्या सभी जन आत्ममुग्ध हैं##
##और क्यों नहीं हूँ यह भी लिखूँगा##
##तुझे तो मणिकर्णिका जाना है##
##तू मूर्ख ही रहेगी##
##गिलहरी वाले फोटो के लिये बहुत अच्छी कविता है##
##👆तेरे लिए नहीं होगी,बौनी##
##उसे भी डालूँगा##
##तेरे लिए Rap Songs बनेंगे##

जड़ हो या हो चेतन भासित,
सब प्रपंच है देखा सम्मुख,
जो पावन है,उर में है बैठा,
मन को तो कर अन्तः मुख,
सब गुथे हुए हैं एक दूजे से,
तो सृष्टि में कहाँ आनन्द नहीं है,
जगत में कौन आत्ममुग्ध नहीं है।।1।।
विस्तार से लेकर संक्षेपण तक,
इस मानव के नख से सिर तक,
दृश्य-अदृश्य मन का विलास है,
मैं उसका ईश्वर, वह मेरा ईश्वर है,
सबका अन्वेषण ईश्वर ही है,
तो सृष्टि में कहाँ आनन्द नहीं है,
जगत में कौन आत्ममुग्ध नहीं है।।2।।
चित्त उड़े विषयों पर जैसे,
प्राण अपान जुते हों जैसे,
बोधाबोध का क्यों सम्मेलन हो,
गुणावगुण का ज्ञान हो कैसे,
सब कुछ ईश्वर है, वह ईश्वर मुझमें,
तो सृष्टि में कहाँ आनन्द नहीं है,
जगत में कौन आत्ममुग्ध नहीं है।।3।।
शोभा न हो बसन्त के पुष्पों में,
वही सर्प वही रज्जु बना दे,
कैसे अन्तर हो आत्मा देह में,
कैसे अभाव का भेद करोगे,
प्रेम-प्रभाव सभी ईश्वर हैं,
तो सृष्टि में कहाँ आनन्द नहीं है,
जगत में कौन आत्ममुग्ध नहीं है।।4।।
पाले की कणिका रवि से नष्ट होती है,
आत्मदर्शन से अविद्या नष्ट होती है,
तो जग का प्रपञ्च क्यों न नष्ट हो?
तो सत्य को खोजो अपने अन्दर,
वह ही है सत रज तम का ज्ञाता,
वही ब्रह्म ही है अपने अन्दर,
तो सृष्टि में कहाँ आनन्द नहीं है,
जगत में कौन आत्ममुग्ध नहीं है।।5।।
©®अभिषेक: पाराशरः ‘आनन्द’

Language: Hindi
1 Like · 53 Views
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