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19 May 2024 · 1 min read

चश्म–ए–बद दूर

चश्म–ए–बद दूर
**************
उम्र के अंतिम से पहले पड़ाव पर
बच्चों की शादियों से
निपटने के बाद

कदाचित अपने शरीर में
पहले जैसा कसाव न हो
कदाचित बिंदास प्रेम का
वह पहले वाला दिखाव न हो

फिर भी कश्मकश से दूर ,
चश्मेबद्दूर लगाव तो है
हमारे बीच ढीला न होने वाला
सदाबहार निभाने की
प्रतिज्ञा के आलिंगन से जकड़ा
गंभीर कसाव तो है ,

रातों की शीतल चाँदनी ,
सुबह की सुनहली धूप
फूलों की महकती क्यारी,
लान की नरम हरी भरी दूब
हमको आज भी लगती है
सुहावनी – अनूप

प्रकृति से निरंतरता की
अपनी आवाजाही सभी को देती है
हमारे बीच अभी भी पल रहे
प्यार की अनूठी गवाही
सच मानों प्यार की मालिका सी
तुम अब भी नजर आती हो

सेवानिवृत में, सेवा विस्तार तो नहीं मिला
लेकिन तुम रोजाना ही
अपने प्यार का विस्तार बढ़ाती हो

टच वुड ,
मैं जिसे शब्दों में कह पाता हूँ
तुम उसे अपने निखालिश
एहसास से समझाती हो ।
– अवधेश सिंह

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