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19 Jul 2022 · 1 min read

चल रहा वो

चल रहा वो निडर होकर
भागता सरपट सड़क पर
एक पल रुकता नहीं वो
है न रंजिश और दहशत
है उठा अरुणाभ मस्तक !

देखता चिरकाल परिवर्तन
मगर रुकता नहीं है ,
सामने पर्वत खड़ा पर वह
कभी झुकता नहीं है ।

बीत रही घड़ियां लेकिन
हर पल नवीन है ,
बदल गया सब मगर नहीं
बदला प्रवीण है ,
अड़ा रहा बाधाओं के आगे
पर्वत बन!

खड़ा रहा पैरों पर टिककर ,
किया नहीं आराम ठिठक कर ,
खड़ा रहा तैयार निरंतर ,
बदल गया कितना युगांतर !

जल थल नहीं मगर वह बहता
अविचल ,निर्मल ,
नहीं तुम्हारा या मेरा कुछ
वश है उस पर ।

किया उसे वश में जिसने वह
सब कुछ पाया ,
बना सिकंदर वही जगत ने
शीश झुकाया!

Language: Hindi
Tag: कविता
2 Likes · 4 Comments · 152 Views
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